कई युवक सदस्य ब्रह्मसमाज को छोड़कर रामकृष्ण के शिष्य बन गए थे। जब विजय गोस्वामी ने भी धर्म परिवर्तन करके साधारण समाज से संबंध विच्छेद
42 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
किया तो ब्राह्म नेता शिवनाथ ब्राह्म को रामकृष्ण के पास जाने से रोकने लगे। उन्हें मालूम था कि नरेन्द्र भी दक्षिणेश्वर जाता है, इसलिए एक दिन उसे वहां जाने से मना करते हुए कहा, ‘‘वह सब समाधि भाव, जो कुछ तुम देखते हो, स्नायु की दुर्बलता ही के चिहृ हैं। अत्यधिक शारीरिक कठोरता का अभ्यास करने के कारण परमहंस का मस्तिष्क बिगड़ गया है।’’
नरेन्द्र ने शिवनाथ बाबू की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। वह उठकर वहां से चला आया। उसके मस्तिष्क में आंधी चल रही थी। और नाना प्रकार के प्रश्न उठ रहे थे। ‘‘ये सरल-हृदय महापुरूष कया है? क्या वे सचमुच विकृत मस्तिष्क है? मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति से वे इतना प्यार किसलिए करते हैं? यह रहस्य क्या है?’’
या ‘‘ना’’ में उत्तर देने के बजाए धर्म-प्रचारक उपदेश वाक्यों से उसे संतुष्ट करना चाहते और अपना पुस्तक-ज्ञान बघारने लगते। नरेन्द्र को तो प्रत्यक्षवादी की खोज थी। धर्म-प्रचारकों की रटी-रटाई सम्प्रदायगत बोलियां सुनकर वह प्रबल संदेहवादी हो गया।
पिता से विरासत में पाई हुई आलोचना-वृत्िा पर पाश्चात्य विचारों की सान चढ़ चुकी थी, अतएव पुस्तक-ज्ञान नरेन्द्र को शान्त नहीं कर पा रहा था। उसे अब एक जीते-जागते आदर्श की खोज थी। इसी खोज का वह कुछ मित्रों के साथ आदि ब्रह्मसमाज का सदस्य बन गया।