मानता हूं। परिवर्तनशील अनत्यि संसार के सुख की कामना में इधर उधर दौड़ने की अपेक्षा उस अपरिवर्तनशील ‘सत्यं, शिवं, सुन्दरम्’ के लिए प्राणपण से प्रयास करना कहीं श्रेष्ठ है।’’

परममित्र तो उसे समझाने का कर्तव्य अपने ऊपर ओढ़कर आया था, वह उत्ोजित होकर बोला, ‘‘देखो नरेन्द्र, तुम्हारी जितनी बुद्वि और प्रतिभा है, उससे तुम जीवन में कितनी उन्नति कर सकते हो। दक्षिणेश्वर के रामकृष्ण ने तुम्हारी बुद्वि बिगाड़ दी है। कुशल चाहते हो तो उस पागल का संग छोड़ दो, नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा।’’

नरेन्द्र पुस्तक छोड़कर कमरे में टलहने लगा। मित्र अपनी बात कहता रहा और उसने रामकृष्ण के बारे में कई प्रश्न पूछे। नरेन्द्र रूका और शांत भाव से बोला, ‘‘भाई, उस महापुरूष को तुम नहीं समझते। वास्तव में मैं भी उन्हें पूरी तरह समझ नहंीं पाया। फिर भी उनमें कुछ ऐसी बात है कि मैं उन्हें चाहता हूं।’’


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अध्ययन और आयु बढ़ने के साथ-साथ नरेन्द्र की जिज्ञासा तीव्र से तीव्रतर

28 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

होती चली गई। मानव जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या सचमुच इस जड़ जगत को चलाने वाली कोई शक्तिमान सत्ता है? इस प्रकार के अनेकों सवाल उसके मस्तिष्क में उठने लगे। पाश्चात्य विज्ञान और दर्शनशास्त्र ने उसके मन में संदेह उत्पन्न कर दिए। नरेन्द्र जब किसी धर्म-प्रचारक को ईश्वर के बारे में भाषण देते सुनता तो झट पूछ बैठता, ‘‘क्यों महाशय, आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं? ‘‘हां’’


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