वे यह भी चाहते थे कि नरेन्द्र रामकृष्ण के चक्कर से निकले और विवाह करके गृहस्थ बने। उसके स्वतंत्र स्वभाव को जानते हुए विश्वनाथ ने इस संबंध में सीधे बात करना उचित नहीं समझा और नरेन्द्र को ढर्रे पर लाने का काम उसके एक प्रिय सहपाठी मित्र को सौंपा।
एक दिन नरेन्द्र ‘तंग’ में बैठा परीक्षा की तैयारी के लिए पाठ्य पुुस्तक पढ़ रहा था, उसका यह सहपाठी मित्र आया और गम्भीर मुद्रा धारण करके कहने लगा, ‘‘नरेन्द्र, साध संग, धर्म, अर्चना आदि पागलपन छोड़! ऐसा काम कर जिससे सांसारिक सुख-सुविधा प्राप्त हो।’’ तथाकथित अनुभवी व्यक्तियों से ऐसी बातें सुनते-सुनते नरेन्द्र के कान पक चुके थे, अब एक प्रिय मित्र के मुंह से भी वहीं उपदेश सुनकर वह स्तब्ध रह गया। कुछ क्षण मौन और स्थिर बैठा रहा, फिर बोला, ‘‘सुन मेरा विचार तुझसे एकदम भिन्न है। मैं संन्यास को मानव जीवन का सर्वोच्च आदर्श
जनरल असेम्बली कालेज के अध्यक्ष विलियम हेस्टी सज्जन व्यक्ति होने के अलावा बड़े विद्वान, कवि और दार्शनिक थे। नरेन्द्र, ब्रजेन्द्र आदि कुछ प्रतिभाशाली विद्यार्थी नियमित रूप से उनके पास जाते और दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया करते थे। हेस्टी नरेन्द्र की बहुमुखी प्रतिभा के बहुत प्रशंसक थे और इसीलिए उसे सबसे अधिक चाहते थे। एक मर्तबा नरेन्द्र ने जब कालेज के ‘दार्शनिक क्लब’ में किसी मत विशेष का सूक्ष्म विश्लेषण किया तो हेस्टी खुशी से झूम उठे और मुक्त कंठ विश्वविद्यालयों में एक भी ऐसा छात्र नहीं है जो इनके समान मेधावी हो।’’ (विवेकानन्द-जीवन चरित्र, पृष्ठ 78)