41 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
ने अपने दर्शन-गं्रथ के उपसंहार में लिखा है, ‘‘संसार का नियामक इेश्वर है-इस सत्य सिद्वांत का आभास पाकर मनुष्य की बुद्वि निरस्त हो जाती है। ईश्वर का स्वरूप क्या है, यह प्रकट करने की शक्ति उसमें नहीं है। अतः दर्शन शास्त्र की वहीं इतिश्री है-और जहां दर्शन की समाप्ति है, वहीं अध्यात्मिकता का प्रारम्भ है।’’ दक्षिणेश्वर में वह रामकृष्ण के शिष्यों से इसकी चर्चा खूब करता था। देखा जाए तो वह जाने-अनजाने इस माध्यम से भी अद्वैतवादी सिद्वान्त के निकट पहुंच गया था। अब थोड़ा ही फासला तय करना बाकी रह गया था।
ऐसी मन-स्थिति में कई बार जीवन-घटनाएं भी निर्णायक भूमिका अदा करती हैं। बी.ए. पास कर लेने से पहले ही विश्वनाथ ने बेटे को प्रसिद्व अटार्नी निमाईचरण बसु के पास जाकर कानून की शिक्षा पाने का आदेश दिया ताकि वह भी पिता की तरह सफल वकील बने। फिर
में भी संकोच नहीं करते थे। पर नरेन्द्र में मन में किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं था। और अपनी ही बात को ऊंचा रखने के लिए वह कभी कुतर्क का सहारा नहीं लेता था। उसे जो कहना होता था दूसरे के सामने साफ-साफ कहता था। कोई उसकी बात से चिढ़ता है, उसके बारे में क्या राय रखता है या उसकी निन्दा करता है-इस बात की उसे ज़रा भी परवाह नहीं थी। उसका हृदय शुद्व था और वह खुद पीठ-पीछे किसी की निंदा या बुराई नहीं करता था। धीरे-धीरे जब उसका यह स्वभाव उजागर हुआ तो विद्यार्थी उसकी बात ध्यान से सुनते और उसका आदर करने लगे।