सत्यनिष्ठ युवकों को अपनी ओर आकृष्ट कर रहा था, पर नरेन्द्र की तर्क-बुुद्वि उससे भी अपना सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रही थी।
नरेन्द्र ने अठारह बरस की आयु में दक्षिणेश्वर जाना शुरू किया था, अब बी.ए. की परीक्षा देते समय उसकी आयु इक्कीस बरस थी। यह तय था कि व्यक्तिगत सुख भोग को उसने अपने आदर्श के रूप में कभी ग्रहण नहीं किया था। सत्य का अनुसंधान समाज, राष्ट्र और मानव जाति का कल्याण ही उसके जीवन का परमध्येय था। अपने आप को इस ध्येय के अनुरूप बनाने के लिए, जिस तरह सोना कुठाली में पिघलाया जाता है, नरेन्द्र ने अपने मस्तिष्क को ज्ञान की कुठाली में पिघला डाला था, लेकिन इस चमकते-मचलते तरल पदार्थ को कुठाली से निकालकर ठोस रूप देने वाला आदर्श पुरूष उसे अभी नहीं मिला था और यह अधिकार उसने अभी रामकृष्ण को भी नहीं दिया था।
इन दिनों वह पाश्चात्य दार्शनिक हेमिल्टन से अधिक प्रभावित था। हेमिल्टन
पर जर्मनी के प्रसिद्व वेदान्ती डाॅ. डायसन को कैसे चकित किया, यह हम डाॅ. डायसन से भेंट के समय लिखेंगे।
अध्ययन का उद्देश्य सत्य की खोज था और नरेन्द्र जिसे सत्य समझ लेता था, उसकी जी-जान से रक्षा करता था। जब देखता था कि कोई दूसरा उसके विपरीत भाव या मत व्यक्त कर रहा है तो नरेन्द्र चट विवाद पर उतर आता था और अपने सशक्त तर्कों और युक्तियों द्वारा उसे परास्त करके दम लेता था। पराजित व्यक्ति कई बार बिलबिला उठते थे और नरेन्द्र पर दम्भी होने का आरोप लगाने