सब इसी में है।’’ दरअसल हाफिज़ की कविता तथा बाइबिल भी वे मन बहलावे अथवा फैशन के तौर पर पढ़ते थे। उनकी स्वार्थ प्रिय बुद्वि को इन दो ग्रंथों की भी और कोई व्यावहारिक उपयोगिता दिखाई नहीं देती थी। वे नितान्त आत्मसेवी थे, धन और यश उनकी जीवन-नौका के दो चप्पू थे। पहले आप सुख भोग से रहो, फिर जो धन बचे उसे दान में देकर दूसरों की दृष्टि में सुखी और श्रेष्ठ बनो। कलकत्ता के शिक्षित समाज में ऐसे ही लोगों की संख्या दिन-दिन बढ़ रही थी। इन लोगों की यह धारणा बन गई थी कि विज्ञान, स्वतंत्र, चिंतन और आध्यात्मिक भी अगर है तो पश्चिम के पास है, हमारे ऋषियों तथा शास्त्रों से अंधविश्वास और दुर्बलता के सिवा और कुछ नहीं सीखा जा सकता। इसी पाश्चात्य शिक्षा के कारण ब्रह्मसमाज दो मे विभाजित हो गई थी। भावावेश में आनन्द-विभोर हो जाने वाले रामकृष्ण का अद्वैतवाद ही ऐसा था जो आत्मत्यागी और


94 of 675

का भी प्रयोजन नहीं होता था। हर पृष्ठ की प्रथम और अंतिम पंक्तियां पढ़कर ही मैं आश्य समझ सकता था। फिर पुस्तक के जिस स्थान पर गं्रथकार ने कोई विषय तर्क-युक्तियों द्वारा समझाया है, वहां यदि प्रमाण-प्रयोग की सहायता से किसी की युक्ति के समझाने में 4-5 या उससे अधिक पृष्ठ लगे हो तो उस युक्ति का आरम्भ मात्र पढ़ कर ही उन पृष्ठों की सारी बातें मैं समझ लेता था।’’ (श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग, तृतीय खंड, पृष्ठ. 60-61)

अपनी इस असाधारण प्रतिभा से नरेन्द्र ने विवेकानन्द बनने


94 of 1117