का त्याग था, जिन्होंने सब कुछ छोड़कर संन्यास धारण किया था। दूसरी तरफ पिता का भोगवाद

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था, जिन्होंने वकालत जमाई थी, ज़्यादा से ज़्यादा रूपया कमाना और ठाठ से खर्च करना ही उनके जीवन का लक्ष्य था। पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से उन्होंने अतीत को भुलाकर वर्तमान में रहना सीखा था। वे संस्कृत नहीं जानते थे, इसलिए गीता और उपनिषद् आदि का अध्ययन उन्होंने नहीं किया था और न करने की आवश्ययकता ही महसूस की थी। वे चाहे अपने को स्वतंत्र चिंतक मानते थे, पर आत्मा तथा शरीर का क्या संबंध है? ईश्वर है या नहीं?-यह जानने की चिंता उन्होंने कभी नहीं की । फारसी के सूफी कवि हाफिज़ की कविता और बाइबिल में दर्ज ईसा मसीह की वाणी ही उनके आध्यात्मिक भाव की चरम सीमा थी। नरेन्द्र को धर्म में प्रवृत्त देखकर उन्होंने एक दिन उसे बाइबिल उपहार में दिया और कहा, ‘‘ले, धर्म-कर्म


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नरेन्द्र की बुद्वि इतनी विकसित हो गई थी कि कोई पुस्तक पढ़ने में अधिक समय नहीं लगाना पड़ता था। अपनी अध्ययन-पद्वति की चर्चा करते हुए वह अपने गुरू-भाइयों से कहा करता थाः

27 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

‘‘अब से कोई पुस्तक पढ़ते समय प्रत्येक पंक्ति क्रमशः पढ़कर गं्रथकर का वक्तव्य समझने की मुझे आवश्यकता नहीं होती थी। हर अनुच्छेद की प्रथम और अंतिम पंक्तियां पढ़ते ही उसके भीतर क्या कहा गया है, मैं समझ लेता था। शनैःशनैः वह शक्ति परिपक्व होने पर हर अनुच्छेद पढ़ने


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