और आदर्श समाज की अभिव्यक्ति के संबंध में बहुत कुछ पढ़ लिया था। उन दिनों जर्मन दार्शनिकों की बड़ी चर्चा थी, इसलिए नरेन्द्र ने कान्ट, फिक्टे, हेगे शाॅपेनहावर के मतवादों से भी परिचय प्राप्त किया था। इसके अलावा स्नायु और मस्तिष्क की गठन एवं कार्यप्रणाली को समझने के लिए मेडिकल कालेज में जाकर व्याख्यान सुने और विषय का अध्ययन किया। लेकिन इस सबसे ज्ञान की प्यास बुझने के बजाय और तीव्र हो उठी। उसके हृदय में सत्य तत्व-निर्णय करने का प्रबल उत्साह था। एक तरफ पश्चिम का भौतिकवाद और दूसरी तरफ दक्षिणेश्वर का अध्यात्मवाद-दोनों के बीच डोल रहा उसका मन अत्यन्त अशान्त था। बिना अनुभव किए ईश्वर को मानने की उपेक्षा नरेन्द्र नास्तिक बन जाना बेहतर समझता था।
निर्णय कर लेना सहज नहीं था। घर का वातावरण और पारिवारिक परम्परा भी दो परस्पर विरोधी आदर्श प्रस्तुत कर रही थी। एक तरफ दादा
लिया था। इसके अलावा संस्कृत कविता, उपनिषद् और राममोहन राय की पुस्तकें भी वह बड़े चाव से पढ़ा करता था। पढ़ते समय वह चंचल और खिलाड़ी नरेन्द्र से एकदम भिन्न दूसरा ही व्यक्ति होता था।
ब्रजेन्द्र बाबू कालेज में नरेन्द्र से दो-तीन बरस आगे थे। पर इन दोनों में खूब पटती थी। वे दोनों ‘दार्शनिक क्लब’ में जाया करते थे। रोमां रोलां ने लिखा है कि ब्रजेन्द्र फ्रांसिसी क्रांति से प्रभावित थे और अराजकतावादी थे। बाद में उन्होंने एक बुद्विवादी के रूप में नाम पाया।
मैट्रिक पास करते-करते