ठीक ही तो कहता है, तो फिर क्या होगा? मैं तो तुझे देखे बिना रह नहीं सकता।’’ संदेह का उदय होते ही रामकृष्ण चट काली मंदिर में मां के पास गए और कुछ क्षण बाद हंसते हुए लौट आए। बोले, ‘‘अरे मूर्ख, मैं तेरी बात नहीं मानूंगा। मां ने कहा, तू उसे (नरेन्द्र को) साक्षात् नारायण मानता है, इसीलिए प्यार करता है। जिस दिन उसके भीतर नारायण नहीं देखेगा, उस दिन उसका मुंह देखने की भी तुझे इच्छा न होगी।’’
1881 से 1884 तक, तीन वर्ष इसी तरह चलता रहा। जब नरेन्द्र ने दक्षिणेश्वर आना-जाना शुरू किया तो उसे एफ.ए. की परीक्षा देने थी। तब तक वह मिल आदि पाश्चात्य नैयायिकों के मतवाद का अध्ययन बराबर जारी रखा। बी.ए. पास करते-करते उसने देकार्त का अहंवाद, ह्मूम और बेनथैन की नास्तिकता, अज्ञेयवाद और आदर्श चिद्वस्तुवाद, डारविन का विकासवाद, काम्टे और स्पेन्सर का अज्ञेयवाद
साहित्य, दर्शन और इतिहास की पुस्तकें अधिक पढ़ता था। देकार्त का अहम्वाद, ह्यूम और वेन की नास्तिकता, डार्विन का विकासवाद और इसके अलावा हर्बर्ट स्पेन्सर का अज्ञेयवाद उसने एफ. ए. की परीक्षा देने से पहले पढ़ डाला था। उसके मित्र ब्रजेन्द्र बाबू ने ‘प्रबुद्व भारत’ पत्रिका में अपने संस्मरण लिखे थे, जिनमें नरेन्द्र की अशन्ति और ज्ञान-पिपासा का चित्र, प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया है कि नरेन्द्र ने शेली की कविताओं, हेगल के दर्शन और फ्रांसिसी क्रांति के इतिहास का अध्ययन भी इसी अवस्था में कर