बहस में तीन-चार घंटे बिता देता। जब इस प्रकार जाते-जाते लगभग एक महीना बीत गया। एक दिन हाज़रा से बातें करने के बाद वह कुछ देर के लिए रामकृष्ण के पास भी जा बैठा।
जब नरेन्द्र उठकर जाने लगा, तब वे बोले, ‘‘जब मैं तुझसे बात नहीं करता, तो फिर किसलिए यहां आता है?’’ नरेन्द्र ने चट उत्तर दिया, ‘‘आपको चाहता हूं, इसीलिए देखने को आता हूं, बात सुनने के लिए नहीं।’’ उसका यह उत्तर सुनकर रामकृष्ण भावानन्द से गद्गद हो उठे।
अपने पर रामकृष्ण का इतना स्नेह देखकर एक दिन नरेन्द्र ने उनसे मज़ाक में कहा, ‘‘पुराण में लिखा है, राजा भरत दिन-रात अपने पालित हिरण की बात सोचते-सोचते मरने के बाद हिरण हुए थे। आप मेरे लिए जितना करते हैं, उससे आप की भी वही दशा होगी।’’ शिशु के समान सरल रामकृष्ण चिंतित होकर बोले, ‘‘तू ठीक कहता है,
गम्भीर चिंतन शक्ति और तीक्ष्ण बुद्वि के कारण नरेन्द्र सभी विषय बहुत थोड़े समय में सीख लेता था। संगीत, स्वच्छंद भ्रमण, मित्रों के साथ खेल-कूद और हंसी-मजाक के लिए उसे काफी समय मिल जाता था। दूसरे लड़के इससे यह समझ लेते थे कि नरेन्द्र की अध्ययन में बिल्कुल रूचि नहीं है। उनकी देखा-देखी जो दूसरे लड़के खेल-कूद में समय बिताते उनके लिए इसका परिणाम अच्छा नहीं होता।
पाठ्य पुस्तकें तो परीक्षा पास करने का साधनमात्र थी, वरना जैसा कि उसका स्वभाव बन चुका था, नरेन्द्रनाथ