चाहिए, कपड़ा चाहिए, सो तुम और तुम्हारी सरकारें उन्हें देने के बजाए उल्टा उनसे छीन रही है।
फिर उन्होंने अपना दावा पेश किया और वेदान्त दर्शन की तात्विक व्याख्या करते हुए बताया कि मनुष्य स्वभाव ही से पवित्र और आत्मस्वरूप है। जब प्रत्येक मनुष्य वेदान्त की चरम-उच्चतम स्थिति में पहुंचकर अपने इस आत्मस्वरूप
को पहचान लेगा तब आपस की घृणा, मतमतान्तर के झगड़े और भौगोलिक सीमाएं मिट जाएंगी। आध्यामिक अद्वैतवाद के आधार पर एक विश्व धर्म और विश्वबंधुत्व का स्वप्न साकार होगा।
विवेकानन्द ने स्वदेश लौटकर अपने कलकत्ता के भाषण में इसी आध्यात्मिक अद्वैतवाद के आधार पर विश्व की आध्यात्मिक विजय को भारत की वैदेशिक नीति का प्रारम्भ और अखंड राष्ट्रीय एकता स्थापित करना अपना प्रधान जीवनोद्देश्य बताया।
अब इतिहास इस बात का साक्षी है कि उन्नीसवीं सदी के अंत तक जो लड़ाई धर्म के क्षेत्र में लड़ी जा
प्रकार अनेकता और द्वैत में होते हुए इस परम अद्वैत की प्राप्ति होती है। धर्म इससे आगे नहीं जा सकता। यही समस्त विज्ञानों का चरम लक्ष्य है।’’
विवेकानन्द ने पहली बार क्रमविकास का सिद्वांत भारतीय दर्शन पर लागू किया और अद्वैत को धर्मशास्त्र की चरम सीमा बताया।
ऐसा अनायास नहीं हुआ। इसके भौतिक और आर्थिक कारण थे, एक विशेष प्रयोजन था। इसे समझने के लिए हमें उस समय की सामाजिक और राजनैतिक परिस्थिति को समझना होगा।
उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्व में हमारे देश