नरेन्द्र को रामकृष्ण के वहा आने का कारण समझने में देर नहीं लगी। उसने आकर उन्हें सम्भाला। जब समाधि भंग हुई तो वह मंदिर के पिछले दरवाजे़ से किसी तरह उन्हें बाहर लाया और गाड़ी में बैठाकर दक्षिणेश्वर पहुंचाया। ब्रह्में ने रामकृष्ण के प्रति तनिक भी शिष्टाचार नहीं दिखाया बल्कि उनका आचरण अभद्रता और उपेक्षा का था। नरेन्द्र के मन पर इससे चोट लगी और उसने इसके बाद ब्रह्मसमाज में जाना छोड़ दिया।

रामकृष्ण ने नरेन्द्र की परीक्षा लेने के लिए एक बार ऐसा भाव अपनाया कि उसके दक्षिणेश्वर आने पर वे उसकी ओर कुछ भी ध्यान नहीं देते थे। न उसका गाना सुनते और न उससे बातें करते। नरेन्द्र ने भी इसकी कोई परवाह नहीं की। वह आता और शिष्यों से हंस-बोलकर लौट जाता। प्रतापचन्द हाज़रा से उसकी

39 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

खासतौर पर पटती थी। वह कभी-कभी उसके साथ बातचीत और


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‘‘तब नरेन्द्र ने स्वयं थोड़ा-सा बजाकर दिखा दिया और कहा, ‘अच्छी तरह से देख ले। अवश्य बजा सकेगा। क्यों नहीं बजा सकेगा? कोई कठिन काम तो है नहीं। इस तरह बस ठेका दिए जा, हो गया।’ साथ ही साथ बजाने के बोल भी बतला दिए। मित्र एक-दो बार चेष्टा करने के बाद किसी तरह ठेका देने लगा। गाना आरम्भ हुआ। तानलय में उन्मुक्त होकर और दूसरों को उन्मुक्त बनाकर नरेन्द्र के हृदयस्पर्शी स्वर में टपपा, ढप, ख्याल, ध्रुुपद, बंगला, हिन्दी और संस्कृत गानों का प्रवाह चलने लगा।’’ (विवेकानन्द साहित्य, अष्टम खंड, पृष्ठ 259-60)


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