नरेन्द्र कोई दो सप्ताह से दक्षिणेश्वर नहीं आया था। रामकृष्ण उसे देखने के लिए व्याकुल हो उठे। कलकत्ता जाकर देखने का निश्चय किया। इतवार का दिन था। सोचा कि नरेन्द्र शायद घर पर न मिले, पर शाम को साधारण ब्रह्मसमाज की उपासना में भजन गाने अवश्य जाएगा। अतएव रामकृष्ण शाम को ब्रह्मसमाज के उपासना-भवन में उसे खोजने गए। जब वे वहां पहुंचे, उस समय आचार्य वेदी से व्याख्यान दे रहा था। वे अपने सीधे-स्वभाव से वेदी की ओर बढ़ चले। उपस्थित सज्जनों में से कइयों ने उन्हें पहचान लिया। खुसर-पुसर शुरू हुई और लोग उचक-उचककर उन्हें देखने लगे।
रामकृष्ण वेदी के निकट पहुंचकर सहसा भावविष्ट हो गए। उन्हें इस अवस्था में देखने की उत्सुकता और भी बढ़ी। उपासना-गृह में गड़बड़ी मचते देख संचालकों ने गैस की बत्िायां बुझा दी। अंधेरा हो जाने के कारण जनता में मंदिर से निकलने के लिए हड़बड़ी मच गई।
किसी मित्र का आगमन हुआ। लगभग ग्यारह बजे होंगे। भोजन करके नरेन्द्र पढ़ रहे थे। मित्र ने आकर नरेन्द्र से कहा, ‘भाई, रात में पढ़ लेना, अभी ज़रा एक-दो गाने तो सुना दो।
26 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
‘‘उसी समय नरेन्द्र ने पुस्तक बंद कर उसे एक ओर सरका दिया। तानपूरे के तारों को संभालकर, उन्हें स्वर में बांधकर गाना गाने से पहले उन्होंने अपने मित्र से कहा, ‘अच्छा तू तबला उठा।’
‘‘मित्र ने कहा, ‘भाई मैं तो बजाना जानता नहीं। स्कूल में मेज़ का तबला बजा लेता हूं, तो क्या तुम्हारे साथ तबला भी बजा सकूंगा?’