थे और कहते थे कि यह शक्ति ही अंत में माया को पराभूत करेगी। वे कहते थे-देखो! कैसी अंतर्भेदी दृष्टि है। यह एक प्रज्वलित अग्निशिखा है, जो समस्त अपवित्रता को भस्म कर देगी। महामाया, स्वयं भी उसके पास दस कदम के अंदर तक नहीं घुस सकती। उसने उसे जो महिमा दी है उसकी शक्ति ही उसे पीछे रोक रखती है।’’ (रामकृष्ण, पृष्ठ 255)

यह भी लिखा हैः

‘‘तथापि कभी-कभी जब उसकी आलोचना दूसरों का कोई ख्याल न करते हुए कठोर भाव से प्रयुक्त होती थी, तो उससे वृद्व रामकृष्ण को दुख अनुभव होता था। नरेन्द्र ने रामकृष्ण के मुंह पर ही कहा था, ‘आप कैसे जानते हैं कि आपकी उपलब्धियां केवल आपके अस्वस्थ मस्तिष्क ही की उपज या केवल दृष्टिीा्रम मात्र नहीं हैं’’?

इन मतभेद के बावजुद अद्भुत पुरूष और असाधारण युवक के आपसी संबंध दिन-दिन कैसे घनिष्ठ और स्निग्ध होते जा रहे थे, इसके दो उदाहरण लीजिए।


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‘‘नरेन्द्र इस समय अपने पिता के घर केवल दो बार भोजन करने जाते हैं और शेष समय समीप की गली में अपनी नानी के घर में रहकर अध्ययन करते हैं। अध्ययन के लिए ही वह यहां रहे हों ऐसी बात नहीं, नरेन्द्र एकान्त में रहना अधिक पसन्द करते हैं।’’

कमरा बहुत छोटा था। नरेन्द्र ने उसका नाम ‘तंग’ रख लिया था और मित्रों से कहा करते थे, ‘‘चलो, तंग में चलें।’’ अब इस ‘तंग’ की एक बैठक देखिएः

‘‘नरेन्द्र आज मन लगाकर पढ़ रहे थे। इसी समय


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