जो ब्रह्म की एकता सूचक शिक्षा देते थे, नरेन्द्र उस पर तनिक भी ध्यान नहीं देता था बल्कि कई बार उसका मज़ाक उड़ाते हुए अपने मित्र हाज़रा से कहा करता था, ‘‘क्या यह सम्भव है? लोटा इेश्वर है? कटोरा ईश्वर है, जो कुछ दिखाई पड़ रहा है तथा हम सब भी ईश्वर है।’’
नरेन्द्र की इस प्रकार की आलोचना से रामकृष्ण के भक्त और शिष्य उससे चिढ़ गए थे। शुरू-शुरू में वे उसे कठी तथा अंहकारी समझने लगे थे। पर नरेन्द्र का ज्ञान देखकर स्वयं रामकृष्ण का आनन्द इतना तीव्र हो उठता था कि वे बीच-बीच में भावानिष्ट हो जाते थे। रोमां रोलां लिखते हैं:
‘‘नरेन्द्र की तीव्र आलोचना और उसके आवेगमय तर्क उन्हें आनन्द से मग्न कर देते थे। नरेन्द्र की उज्जवलतम तर्क बुद्वि और सत्य के अनुसंधान के लिए उसकी अथक निष्ठा के प्रति उनकी गहरी श्रद्वा थी, वे उसे शैव-शक्ति का प्रकाश मानते
38 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
विद्यार्थी उसे अपना मित्र बनाने में गर्व महसूस करते थे। प्रियनाथ सिन्हा नाम के एक मित्र सहपाठी ने इन दिनों के अपने संस्मरण में लिखा हैः
‘‘नरेन्द्रनाथ हेदो तालाब के पास जनरल असेम्बली कालेज में भर्ती हुआ और एफ.ए. वहीं से पास किया है। उनके असंख्य गुणों के कारण बहुत से सहपाठी उनमें अत्यंत अनुरक्त हैं। वे उनका गाना सुनकर इतना आनन्दप्रद मानते हैं कि अवकाश पाते ही नरेन्द्र के घर पर उपस्थित हो जाते हैं। बैठकरएक बार नरेन्द्र की तर्क-युक्ति या गाना-बजाना आरम्भ होते ही समय कैसे निकल जाता है, वे समझ नहीं पाते।