‘‘मां, मैंने जो कुछ उपलब्धियां प्राप्त की हैं, उनमें संदेह करने वाले किसी व्यक्ति को मेरे पास भेज दो।’’
नरेन्द्र ने विज्ञान और पाश्चात्य दर्शन पढ़ा था। उसने जब दक्षिणेश्वर आना-जाना शुरू किया तो वह अंधविश्वास और मूर्ति-पूजा से सख्त घृणा करता था। उस समय न सिर्फ भक्तगण रामकृष्ण को अवतार मानते थे, बल्कि वे खद भी अपने को अवतार मानते थे और शिष्यों से कहते थे, ‘‘जो राम था, जो कृष्ण था वही अब रामकृष्ण है।’’ लेकिन नरेन्द्र ने इस बारे में उन्हें साफ-साफ कहा, ‘‘चाहे सारी दुनिया आपको अवतार कहे, पर जब तक मुझे इसका प्रमाण नहीं मिलता, मैं आपको वैसा न कहूंगा।’’
रामकृष्ण ने मुस्कराते हुए नरेन्द्र की बात का समर्थन किया और शिष्यों से कहाः
‘‘किसी भी बात को केवल मेरे कहने के कारण स्वीकार न करो। तुम स्वयं हर एक बात की परीक्षा करो।’’
रामकृष्ण अद्वैत सिद्वान्त की
में उसकी चार पुस्तकें पढ़कर परीक्षा दे आया।’ ईश्वर-कृपा से उन्हें दृढ़ शरीर तथा अपूर्व मेघा प्राप्त थी, इसलिए वे ऐसा कर सके थे, इसमें कोई संदेह नहीं।’’ (तृतीय खंड, पृष्ठ 59-60)
मैट्रिक पास करने के बाद नरेन्द्रनाथ जनरल असेम्बली कालेज में भर्ती हुआ और एफ.ए. में पढ़ने लगा। इस समय उसकी उम्र अठारह बरस थी। उसकी तेज बुद्वि और आकर्षक व्यक्तित्व ने अध्यापकों और छात्रों दोनों का ध्यान आकर्षित किया। थोड़े ही समय में बहुत-से विद्यार्थी उसके मित्र बन गए। दरअसल