‘‘मां ने दिखा दिया या आपके मस्तिष्क का ख्याल है, कैसे समझुं?’’ नरेन्द्र
37 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
बोला, ‘‘मुझे तो, महाराज यदि ऐसा होता तो यही विश्वास कर लेता तो यह मेरे मस्तिष्क ही का ख्याल है। पाश्चात्य विज्ञान और दर्शन ने इस बात को निस्संदेह प्रमाणित कर दिया है कि कान, आंख आदि इंद्रियां कई बार हमें भ्रम में डाल देती है। ये हमें पग-पग पर धोखा देती रहती हैं। आप मुझे प्यार करते रहते हैं और प्रत्येक विषय में मुझे बड़ा देखने की इच्छा करते हैं-इसीलिए सम्भवतः आपको ऐसे दर्शन होते रहते हैं।’’
जो बात तर्क की कसौटी पर खरी न उतरे उस पर विश्वास कर लेना नरेन्द्र के स्वभाव के विपरीत था। वह रामकृष्ण के हर शब्द को तोलता था और संदेह व्यक्त रनके में सकुचाता नहीं था। रामकृष्ण भी नाराज़ होने या बुरा मानने के बजाय, इसी से उसे अधिक चाहते थे। नरेन्द्र के आने से पहले उन्हें काली से यह प्रार्थना करते सुना गया थाः
इच्छा के अनुसार दूसरी पुस्तकें पढ़कर समय बिताते थे। इस प्रकार मैट्रिक परीक्षा देने के पहले उन्होंने अंगे्रजी और बंगला के अनेक साहित्यिक तथा ऐतिहासिक गं्रथ पढ़ डाले थे। फलतः परीक्षा के पूर्व उन्हें कभी-कभी बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता था। हमें स्मरण है, एक दिन उन्होंने इस विषय का प्रसंग उठने पर हमें बताया था, ‘‘मैट्रिक परीक्षा के आरम्भ होने के दो-तीन दिन पहले मैंने देखा कि रेखागणित कुछ भी नहीं पढ़ा गया है। तब सारी रात जागकर उसे पढ़ने लगा और 24 घंटे