बातें करते थे और किसी प्रकार के बड़प्पन का भाव प्रदर्शित नहीं करते थे।’’ (रामकृृष्ण, पृष्ठ 2014)

एक दिन की बात है कि केशवचन्द्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी आदि ब्रह्मसमाज के कुछ प्रसिद्व नेता रामकृष्ण के पास बैठे थे। नरेन्द्र भी वहां मौजूद था। परमहंस भावावेश में उनकी ओर देखते और बातें करते रहे। लेकिन जब वे चले गए तो रामकृष्ण ने अपने भक्तों को मुखातिब करके कहा, ‘‘भाव में मैंने देखा, केशव ने जिस एक शक्ति के बल पर प्रतिष्ठा प्राप्त की है, नरेन्द्र में उस प्रकार की अठारह शक्तियां हैं। कृष्ण और विजय के मन में ज्ञान-दीप जल रहा है, नरेन्द्र में ज्ञान-सूर्य विद्यमान है।’’

नरेन्द्र ने प्रतिवाद किया, ‘‘क्या कहते हैं आप? कहां विश्वविख्यात केशव सेन और कहां स्कूल का एक नगण्य लड़का नरेन्द्र। लोग सुनेंगे तो आपको पागल कहेंगे। रामकृष्ण ने मृदुहास्य कर सरल भाव से उत्तर दिया, ‘‘मैं क्या करूं भला? मां ने दिखा दिया, इसीलिए कहता हूं।’’


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25 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

संगीत में नरेन्द्र के मुसलमान उस्ताद ‘बंनी’ और हिंदू उस्ताद कांसी घोषाल थे। कांसी घोषाल आदि ब्रह्मसमाज की संगीत-साधना में पखावज बजाया करते थे। नरेन्द्र ने पखावज और तबला इन्हीं से सीखी। साहित्य इतिहास और दर्शन पारिवारिक परम्परा थी। इस विषय में उसके गुरू भाई स्वामी सारदानन्द ने अपनी पुस्तक ‘श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग’ में लिखा है:

‘‘बड़े होने पर परीक्षा के दो-तीन मास पहले वे अपनी पाठ्य-पुस्तकों को पढ़ना आरम्भ करते थे, अन्य समय अपनी


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