का पारा चढ़ गया। उसने राखाल पर प्रतिज्ञा भंग करने का दोष लगाया और उसे मिथ्याचारी कहा। राखाल ने अप्रतिभ होकर गर्दन झुका ली। उससे कहते न बन पड़ा। लेकिन रामकृष्ण ने उसका पक्ष लेकर नरेन्द्र से कहा, ‘‘उसकेा यदि अब साकार में भक्ति हो, तो वह क्या करेगा? तुम्हें अच्छा न लगे, तो तुम न करो। पर इस प्रकार दूसरों का भाव नष्ट करने का तुम्हें क्या अधिकार है?’’

रामकृष्ण अपने विचार किसी पर थोपते नहीं थे और अगर कोई दूसरा किसी पर थोपे तो वे उसका विरोध करते थे। अपने शिष्यों के प्रति रामकृष्ण के व्यवहार के बारे में रोमां रोलां लिखते है, ‘‘उस समय तक भारतवर्ष में गुरू का उसके शिष्य माता-पिता से भी बढ़कर आदर करते थे। परन्तु रामकृष्ण ऐसा कुछ न चाहते थे। वे अपने-आपको अपने शिष्यों के समान समझते थे। वे उनके साथी, उनके भाई थे। वे घनिष्ठ मित्र के रूप में उनसे


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बलिष्ठ सुगठित शरीर कसरतों से और भी मंज गया था-कुश्ती, घोड़े की सवारी, तैरने और नाव खेने का उन्हें शौक था। युवकों के वे नेता और फैशन के नियंता थे। नृत्योंत्सवों में वे कलापूर्ण नृत्य करते थे और उनका कंठ बड़ा सुरीला था, जिसपर अनन्तर रामकृष्ण भी मुग्ध हुए। उन्होंने चार-पांच वर्ष तक हिंदू और मुसलमान संगीताचार्यों के साथ गायन और संगीत का अभ्यास किया। वह स्वयं गीत लिखते भी थे और उन्होंने भारतीय संगीत के दर्शन और विज्ञान पर एक संदर्भ ग्रंथ भी प्रकाशित किया...’’ (पृष्ट 36)


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