दिए। लेकिन इनमें व्यक्त मान्यताएं नरेन्द्र के पूर्व संस्कारों तथा मान्याताओं के विपरीत थी, इसलिए वह झुंझला उठता,:ःमैं ये पूस्तकें नहीं पढूंगा। मनुष्य को ईश्वर कहना, इससे बड़ा पाप और क्या होगा? गं्रथकर्ता ऋषि-मुनियों का मस्तिष्क अवश्य ही विकृत हो गया था, नहीं तो ऐसी बातें वे कैसे लिख पाते?’’ रामकृष्ण मृदु मुस्कान होंठों पर लाकर शान्त भाव से उत्तर देते, ‘‘तू इस समय उनकी बातें न लेना चाहे तो न ले, पर ऋषि-मुनियों की निंदा क्यों करता है? तू सत्य स्वरूप भगवान को पुकारता चल, उसके बाद वे जिस रूप में तेरे सामने प्रकट होंगे, उसी पर विश्वास कर लेना।’’

राखालचन्द घोष नरेन्द्र के साथ ही ब्रह्मसमाज का सदस्य बना था। अब नरेन्द्र से कुछ दिन पहले ही वह दक्षिणेश्वर आने-जाने लगा था। एक दिन नरेन्द्र ने देखा कि वह रामकृष्ण के पीछे-पीछे मंदिर में जाकर देवमूर्तियों को प्रणाम कर रहा है। नरेन्द्र


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समय में वह क्रिकेट का भी अच्छा खिलाड़ी था। उसे घोड़े की सवारी का शौक था। पिता ने उसके लिए एक अच्छा-सा घोड़ा खरीद दिया था, जिसपर सवार होकर वह हवाखोरी कि लिए जाया करता था। विश्वविख्यात लेखक रोमां रोला ने अपनी पुस्तक ‘विवेकानन्द’ में लिखा हैः

‘‘नरेन्द्र का शैशव और बाल्यकाल यूरोपीय पुनर्जागरण काल के कलाप्रेमी राजकुुमार का-सा रहा। उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी और सभी दिशाओं में उन्होंने उसका विकास किया। उनका रूप सिंह शावक का सा प्रभावशाली और मृग छौने-सा कोमल था।


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