था, लेकिन शिष्य के रूप में ग्रहण करनके से पहले उसकी भी परीक्षा लेना आवश्यक था। हो सकता है कि दृष्टि ने धोखा खाया हो। इसी तरह जो व्यक्ति शिक्षा देने का योग्य अधिकारी न हो, उसे नरेन्द्र उसे गुरू धारण करने को तैयार नहीं था, इसलिए उसने भी रामकृष्ण के स्वभाव और शक्ति की परीक्षा लेना आवश्यक समझाा। यों कहिए कि एक अद्भुत पुरूष और एक असाधारण युवक अपने-अपने कक्षपथ में घूमने वाले नक्षत्रों की तरह सहसा एक दूसरे से आ टकराए और उन दोनों में गुरू-शिष्य का संबंध होने से पहले वे एक-दूसरे की परीक्षा लेते-एक दूसरे को समझते-परखते रहे।
नरेन्द्र दक्षिणेश्वर आने से पहले ब्रह्मसमाज का सदस्य था और उसके प्रतिज्ञा-पत्र, ‘निराकार अद्वितीय ईश्वर रखकर केवल उसी की उपासना करूंगा’ पर हस्ताक्षर भी किए थे। अब रामकृष्ण ने उसे अष्टावक्र संहिता आदि ग्रंथ पढ़ने को
36 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
कुश्ती का अभ्यास करता आ रहा था। यह राजनैतिक चेतना का युग था। सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी और आनन्दमोहन बसु ने विद्यार्थी संघ की स्थापना की थी और वे नौजवानों को शारीरिक और मानसिक रूप से सबल होने की शिक्षा देते थे। शिमला मोहल्ला में कार्नवालिस स्ट्रीट के पास एक अखाड़ा था। हिंदू मेले के प्रवर्तक नवगोपाल मित्र ने उसकी स्थापना की थी। नरेन्द्रनाथ अपने मित्रों के साथ वहीं व्यायाम का अभ्यास किया करता। बाॅक्सिंग (मुुक्केबाजी) में वह एक बार सर्वप्रथम आया और उसे चांदी की तितली पुरस्कार में मिली। अपने