दिया था। ‘‘सच्ची बात यह है कि मैं धर्म-महासभा का उद्देश्य लेकर अमेरिका नहीं गया, वह सभा तो मेरे लिए गौण वस्तु थी, उससे हमारा रास्ता बहुत कुछ साफ हो गया और कार्य करने की बहुत कुछ सुविधा हो गई।’’

विवेकानन्द ने धर्म-महासभा में आक्रमण रूख अपनाकर मिशनरियों के इस दावे को झुठलाया कि ईसाई धर्म चूंकि विजेताओं का और समृद्वि का धर्म है, इसीलिए यह सच्चा धर्म है और इसी को विश्व धर्म बनना है। विवेकानन्द ने उनके इस दावे को झुठलाते हुए कहा कि क्रमविकास के सिद्वांत के अनुसार द्वैत, विशिष्टाद्वैत, अद्वैत, एक के बाद एक, धर्म के तीन सोपान-तीन स्थितियां हैं। ईसाई धर्म तो अभी पहली ही सीढ़ी पर मंडरा रहा है और वह धर्म आज से हज़ारों साल पहले अद्वैतवाद की चरम सीमा तक पहुंच चुका था। धर्म तुम हमें क्या सिखाओगे, वो तुम जितना चाहे हमसे ले लो। भारत की जनता को तो रोटी


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तब वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। उदाहरणार्थ, रसायन शास्त्र यदि एक बार उस मूल तत्व का पता लगा ले, जिससे और सब द्रव्य बन सकते हैं, तो वह फिर और आगे नहीं बढ़ सकेगा। भौतिकी जब उस एक मूल शक्ति का पता लगा लेगी, अन्य शक्तियां जिसकी अभिव्यक्ति हैं, तब वह वहीं रूक जाएगी। वैसे ही, धर्मशास्त्र भी उस समय पूर्णता को प्राप्त कर लेगा, जब वह उसको खोज लेगा, जो इस मृत्यु के इस लोक में एकमात्र जीवन है, अन्य सब आत्माएं जिसकी प्रतीयमान अभिव्यक्तियां है। इस


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