दूसरे ब्रह्मों की तरह नहीं-वह यथार्थ ब्रह्मज्ञानी है। ध्यान के लिए बैठते ही उसे ज्योति दर्शन होता है, उसे मैं यों ही प्यार नहीं करता।’’(रामकृष्ण लीला प्रसंग, तृतीय खंड, पृ. 101)

नरेन्द्र के इन्हीं गुणों के कारण रामकृष्ण अपने शिष्यों में उसे सबसे अधिक प्यार करते और उसे अपनाकर अपने युग-कार्य के लिए तैयार करना चाहते थे। लेकिन नरेन्द्र भी सहज मंे हाथ लग जाने वाला नहीं था। वह भी दृढ़ संस्कारयुक्त गठन का असाधारण युवक था, जिसके बाहरी आचरण से लोग उसे उद्दंड, हठी, दम्भी तथा कैसे तड़प् रहा है और जीवन रहस्य पा जाने के लिए सुख-भोग तो क्या, वह प्राण तक होम कर सकता है।

रामकृष्ण किसी भी व्यक्ति को जांच-परखकर अपना शिष्य बनाया करते थे। नरेन्द्र की असाधारण प्रतिभा को चाहे उन्होंने पहचान लिया था और चाहे वे उसे तन-मन से प्यार करते थे, उसे देखे बिना चैन न पड़ता


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रूप से बहुत बदल चुका था। मित्र उसे अपने बीच पाकर बहुत प्रसन्न हुए। वह स्कूल में दाखिल हुआ और नवीं और दसवीं कक्षा की तैयारी एक साल में की। लेकिन स्कूल में सिर्फ वही एक विद्यार्थी था, जिसने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। इससे न सिर्फ सगे संबंधियों बल्कि स्कूल के अधिकारियों को भी बड़ी खुशी हुई।

नरेन्द्र शरीर से हष्ट-पुष्ट था और सोलह बरस की आयु में बीस बरस का जान पड़ता था। कारण यह कि वह नियमित रूप से व्यायाम किया करता था। बचपन ही से वह


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