अपनी अंतदृष्टि से भांप लिया कि उनके ‘जितने मत उतने पथ’ सार्वभौम संदेश का प्रचार करने के लिए नरेन्द्र एक योग्य अधिकारी है। सिर्फ इतना ही नहीं उनकी मिथक-Ûष्टा समृद्व कल्पना ने उसे ‘सप्तर्षि-मंडल में से एक नर-रूपी नारायण’ बना दिया।

जिस तरह रामकृष्ण परमहंस को देखकर नरेन्द्र की एक राय बनी थी, उसी तरह नरेन्द्र को देखकर परमहंस की जो राय बनी, उसे उन्होंने यों व्यक्त किया हैः ‘‘मेरे नरेन्द्र के भीतर थोड़ी भी कृत्रिमता नहीं है। बजाकर देखो तो ठन-ठन शब्द होता है। दूसरे लड़कों को देखता हूं, मानो आंख-कान दबाकर किसी तरह दो-तीन परीक्षाओं को पार कर लिया है, बस वहीं तक-उतना करते ही सारी शक्ति निकल गई है। परन्तु नरेन्द्र वैसा नहीं है, हंसते-हंसते सब काम करता है, पास करना उसके लिए कोई बात ही नहीं। वह ब्रह्मसमाज में भी जाता है, वहां भजन गाता है। परन्तु


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भी निपुण थे। नरेन्द्र ने उनसे तरह-तरह के भोजन बनाने सीखें कालेज में वे अपने मित्रों को समय-समय पर अपने हाथ से भोजन बनाकर खिलाया करते थे। फिर जब वे स्वामी विवेकानन्द बनकर विश्व-भ्रमण पर गए तो विदेशियों को भारतीय खानों का स्वाद चखाया करते थे। अमेरिका में ‘सहÛद्वीप उद्यान’ में दो महीने के सहवास में वह अपने शिष्यों को प्रायः अपने हाथ से विभिन्न भारतीय व्यंजन तैयार करके खिलाते थे।

दो बरस के बाद जब नरेन्द्रनाथ रायपुर से लौटा तो वह शारीरिक और मानसिक


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