दिन बरामदे में बेचैन घूर रहे थे और रोते हुए कह रहे थे , ‘‘मां, उसे देखे बिना मैं रह नहीं सकता।’’ कुछ क्षण बाद उन्होंने अपने को सम्भाला और कमरे में शिष्यों के पास आकर बैठ गए, ‘‘इतना रोया, पर नरेन्द्र नहीं आया’’ वे बेसुध से कह रहे थे, ‘‘उसे एक बार देखने के लिए मेरे हृदय में बड़ी पीड़ा होती है, छाती के भीतर मानो कोई मरोड़ रहा है, पर मेरे खिंचाव को वह नहीं समझता।’’ जब नरेन्द्र आ जाता तो पहले उससे गाने सुनते और फिर खूब खिलाते-पिलाते थे। कई बार उसे ढूढ़ने खुद भी शहर जाते थे।

रामकृष्ण नरेन्द्र को अपने शिष्यों में सबसे अधिक प्यार करते थे। उन्होंने सुरेन्द्रनाथ के मकान पर पहली ही नज़र में पहचान लिया था कि नरेन्द्र एक सत्यनिष्ठ

35 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

और दृढ़-चरित्र युवक है और उसमें लोकनायक बनने की बड़ी सम्भावनाएं हैं। रामकृष्ण ने


77 of 675



अगर कोई व्यक्ति नरेन्द्र की युक्तिपूर्ण बातों को बच्चे की धृष्टता समझकर उपेक्षा करता तो वह क्रोध के मारे आपे से बाहर हो जाता। उस समय उसे छोटे-बड़े का भी ध्यान न रहता। कई बार वह अपने पिता के मित्रों तक को खरी-खरी सुना देता। विश्वनाथ इस उद्दंडता के लिए बेटे को क्षमा नहीं करते थे। वे नरेन्द्र को दंड देकर आगे के लिए सावधान कर देते थे। पर बेटे की आत्मनिष्ठा को देखते हुए मन ही मन में वे प्रसन्न भी होते थे।

24 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

विश्वनाथ पाकविद्या में


77 of 1117