नहीं। वे संज्ञाशून्य नहीं हुए हैं, वे भावास्थ हुए हैं। फिर से गाना सुनते-सुनते वे चेतनायुक्त हो जाएंगे।’ नरेन्द्र ने इस बार श्यामा-विषयक गाना प्रारम्भ किया। उन्होंने एक बार ‘तेमनि तेमिन तेमनि करे नाचो मां श्यामा’ इस प्रकार के बहुत से श्यामा-विषयक कभी भावविष्ट हो जाते थे और कभी स्वाभाविक अवस्था प्राप्त कर लेते थे। नरेन्द्र बहुत देर तक गाना गाते रहे। अंत में गाना समाप्त होने पर श्री रामकृष्ण देव बोले, ‘‘दक्षिणेश्वर चलेगा? कितने दिनों से नहीं गया है। चल न, फिर लौट आना।’’ नरेन्द्र उसी समय तैयार हो गए। पुस्तक आदि उसी तरह पड़ी रही। केवल तानपूरे को यत्नपूर्वक रखकर उन्होंने श्री गुरूदेव के साथ दक्षिणश्वर प्रस्थान किया।’’ ( विवेकानन्द साहित्य,अष्टम खंड, पृष्ठ 260-62)
नरेन्द्र अगर कुछ दिन तक दक्षिणेश्वर नहीं जाता था तो रामकृष्ण बहुत व्याकुल हो उठते थे। 1883 की बात है, वे एक
विश्वनाथ बेटों को सामंती ढंग से कभी डांटते-डपटते या बुरा-भला नहीं कहते थे, बल्कि उन्हें सुधारने और उनमें आत्मविश्वास पैदा करने का उनका अपना ही ढंग था। अपने उद्दंड स्वभाव के कारण नरेन्द्र ने एक दिन मां को कुछ कटु शब्द कह दिए। विश्वनाथ ने इसके लिए बेटे को कुछ नहीं कहा, पर जब नरेन्द्र अपने सहपाठियों के साथ अपने पढ़ने के कमरे में गया तो कोयले से दीवार कर यह लिखा मिलाः ‘‘नरेन्द्र बाबू ने अपनी माता के प्रति आज इन दुर्वचनों का प्रयोग किया है।’’ नरेन्द्र की गर्दन लज्जा से झुक गई और वह इस शिक्षा को उम्र भर नहीं भूल पाया।