जागो मां कुल कुंडलिनी
..........................
..........................
‘‘ज्योंही गाना आरम्भ हुआ, श्री रामकृष्ण भी भावास्थ होने लगे। गाने के स्तर-स्तर में उनका मन ऊपर उठने लगा, आंखे भी अपलक हो गई, अंग स्पंदनहीन हो गए, मुख ने अलौकिक भाव धारण किया, और धीरे-धीरे संगमरमर की मूर्ति के समान निस्पंद हो वे निर्विकल्प समाधि में लीन हो गए। नरेन्द्र के मित्रों ने इससे पहले किसी मनुष्य को इस प्रकार भावास्थ नहीं देखा था। वे श्री रामकृष्ण की यह अवस्था देखकर मन में सोचने लगे-मालूम होता है, शरीर में किसी प्रकार की वेदना सहसा उत्पन्न हो गई है, इसलिए वे संज्ञाशून्य हो गए हैं। वे बहुत डरे। दशरथि तो जल्दी-जल्दी पानी लाकर उनके मुख पर छींटा देने का प्रयत्न करने लगे। यह देखकर नरेन्द्र उनको रोककर कहने लगे, ‘उसकी कोई आवश्यकता
नरेन्द्र रायपुर में दो बरस तक रहा। इस बीच में उसने पुस्तकों और वाद-विवाद द्वारा जो कुछ सीखा वह तो सीखा ही, पर इस संबंध में विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि उसके किशोर मन पर पिता के व्यक्तित्व की गम्भीर छाप पड़ी। एक दिन नरेन्द्र ने जाने कैसे पिता से पूछा, ‘‘पिताजी, आप हमारे लिए क्या छोड़ रहे हैं?’’ विश्वनाथ ने दीवार पर लगे आइने की तरफ इशारा करते हुए उत्तर दिया, ‘‘जा, आइने में अपना चेहरा देख, तभी समझेगा कि मैंने तुझे क्या दिया है।’’