लिया कि श्री रामकृष्ण देव आये हैं, इसलिए नरेन्द्र इतने अस्त-व्यस्त होकर उन्हें परस्पर साक्षात्कार हुआ। श्री रामकृष्ण नरेन्द्र को देखते ही अश्रुपूर्ण लोचनों से गद्गद स्वर में कहने लगे, ‘तू इतने दिनों तक आया क्यों नहीं, तू इतने दिनों तक आया क्यों नहीं?’ बार-बार इस तरह कहते-कहते कमरे में आकर बैठ गए, बाद में अंगोछे में बंधे संदेश को खोलकर नरेन्द्र को ‘खा’ , ‘खा’ कहकर खिलाने लगे। वे जब कभी नरेन्द्र को देखने आते, तो कुछ-न-कुछ अति उत्तम खाद्य वस्तु उनके लिए अवश्य बांधकर ले आते थे, बीच-बीच में लोगों के द्वारा भी भेज देते थे। नरेन्द्र अकेले खाने वाले तो थे नहीं, उनमें से कुछ संदेश लेकर पहले अपने मित्रों
34 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
को दिए, फिर स्वयं खाया। श्री रामकृष्ण इसके बाद बोले, ‘अरे तेरा गाना तो बहुत दिनों से नहीं सुना, जरा गाना तो गा।’ उसी समय तानपूरा लेकर, उसका कान ऐंठ, स्वर बांधकर नरेन्द्र ने गाना प्रारम्भ कियाः-
कर रहे थे तो उसमें भाग लेने के लिए नरेन्द्र को भी बुला लिया गया। बस, अब क्या था, नरेन्द्र ने थोड़े ही समय में यह सिद्व कर दिखाया कि उसने अधिकांश लेखकों की पुस्तकें न सिर्फ पढ़ ली हैं, बल्कि उनके बहुत-से अंश उसे कंठस्थ हैं और वह उनकी तर्कसंगत आलोचना भी कर सकता है। उन लेखक महोदय ने विस्मय और आनन्द में भरकर कहा, ‘‘बेटा! आशा है, एक दिन बंग भाषा तुम्हारे द्वारा गौरवान्वित होगी।’’
और अब यह कहने की कोई आवश्यकता नहीं कि उन लेखक महोदय की भविष्यवाणी सही सिद्व हुई।