इस आदर्श को कार्य-रूप देने के लिए उन्हें संगठन की ज़रूरत महसूस हुई। इसके लिए उन्होंने 1884 में शिष्य बनानाा शुरू किए और 1886 में अपनी मृत्य के समय तक 25 शिष्य जुटा लिए थे। नरेन्द्र उन सबमें श्रेष्ठ था और परमहंस ने उसके निर्माण में अपनी पूरी शक्ति लगा दी। नरेन्द्र से उनका प्यार जुनून की हद तक बढ़ गया था। प्रियनाथ सिन्हा अपने संस्मरण में लिखते हैंः

‘‘नरेन्द्र बहुत दिनों से श्री रामकृष्ण देव के पास नहीं गए थे। इसीलिए वे स्वयं एक दिन सवेरे रामलाल के साथ कलकत्ता में नरेन्द्र के तंग में आए। उस दिन सवेरे नरेन्द्र के कमरे में दो सहपाठी, हरिदास चट्टोपाध्याय और दशरथि सान्याल बैठे थे। ये लोग कभी पढ़ते थे, तो कभी वार्तालाप करते थे। इसी समय बहिद्र्वार पर ‘नरेन’, ‘नरेन’ शब्द सुनाई पड़ा। स्वर सुनते ही नरेन्द्र हड़बड़ाकर तेजी से नीचे पहुंचे। उनके मित्रों ने भी समझ


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होता और सूक्ष्म विवेचन किया जाता था। उस समय प्रायः नरेन्द्र भी वहीं उपस्थित होता और वाद-विवाद ध्यान से सुना करता था। कभी-कभी विश्वनाथ नरेन्द्र से भी किसी विषय पर उसकी राय पूछ लेते और यों उसे विवाद में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते थे। नरेन्द्र उम्र में चाहे छोटा था, पर उसके विचार इतने साफ-सुथरे और सुलझे हुए थे कि सुनकर बड़े-बूढे़ भी आनन्द से झूम उठते थे।

विश्वनाथ के मित्रों में एक सज्जन बंग-साहित्य के प्रसिद्व लेखक थे। एक दिन जब वे साहित्य पर वाद-विवाद


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