कड़िया हैं, जिन्हें समझे बिना उस पहेली को सुलझाना मुमकिन नहीं, जिसे तथाकथित आध्यात्मवादियों ने बुरी तरह उलझा दिया है, और तथाकथित बामपंथियों ने जिसकी निरन्तर अवहेलना तथा उपेक्षा की है।
द्वन्द्व
‘‘सत्य तो केवल उन्हीं को प्राप्त होता है, जो निर्भय होकर, बिना दुकानदारी किए उसके मंदिर में जाकर केवल उसी के हेतु उसकी पूजा करते हैं।’’
-विवेकानन्द
रामकृष्ण परमहंस एक सच्चे मनीषी थे। वह अपने मनन और भिन्न-भिन्न समाधियों द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ‘एक ही सत्ता एक साथ एक भी है और अनेक भी है’ और फिर घोषणा की थी कि हिंदू, मुसलमान, ईसाई तथा वैष्णव आदि सम्प्रदायों का धर्म के नाम पर आपस में लड़ना व्यर्थ है। उन्होंने एक ही सत्ता के ईश्वर, अल्लाह तथा गाॅड- अलग-अलग नाम रख लिये हैं और अपने-अपने मार्ग से एक उसी की खोज कर रहे हैं।
अब अपने
थी। फुरसत ही फुरसत थी। पाठ्य-पुस्तकों के अलावा वे नरेन्द्र को इतिहास, दर्शन और साहित्य संबंधी विभिन्न पुस्तकें पढ़ाने लगे। बेटे की ग्राह्म-शक्ति देखकर विश्वनाथ दंग रह गए और उन्हें पढ़ाने में आनन्द भी आने लगा। उन्होंने बड़े परिश्रम से जितना ज्ञान अब तक अर्जित किया था। वह अपने इस सुयोग्य पुत्र को सौंप दिया।
उनके घर में हर रोज़ रायपुर के गुण-ज्ञानी व्यक्तियों का जगघट होता था।
23 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
साहित्य, दर्शन आदि विभिन्न विषयों पर चर्चा चलती थी। घंटों वाद-विवाद