प्रचंड आघात प्राप्त हुआ है। इससे संकल्प का उदय हुआ-जैसे भी हो सके, इस अद्भुत पुरूष के स्वभाव और शक्ति की बात अवश्य ही समझनी होगी।’’
छरअसल यह अद्भुत पुरूष ही वह जीता-जागता आदर्श था, नरेन्द्र जिसे खोजता हुआ दक्षिणेशर पहुंचा था। लेकिन इस दृढ़ संस्कारयुक्त युवक ने इस अद्भुत
32 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
पुरूष को तब तक गुरू के रूप में धारण नहीं किया जब तक उनके स्वभाव और शक्ति को भली प्रकार समझ नहीं लिया।
अब देखना यह है कि इस अद्भुत पुरूष का स्वभाव और शक्ति क्या थी। नरेन्द्र ने उसे कैसे पहचाना और इस अद्भुत पुरूष ने नरेन्द्र को विवेकानन्द बनाने में क्या भूमिका अदा की? यह न सिर्फ हमारा, बल्कि भारतीय दर्शन के इतिहास का आवश्यक रोचक विषय है। गुरू और शिष्य-रामकृष्ण और विवेकानन्द, व्यक्ति नहीं युग-पुरूष हैं, हमारे राष्ट्रीय विचार के विकास-क्रम की ऐसी ऐतिहासिक
देखा था। देश के अतीत की कहानियां उसके मन पर पहले ही से अंकित थी, अब उसका रूप, उसका वैभव, विशालता और महानता भी अंकित हो गई। देश को और अधिक देखने की इच्छा भी यहीं से पैदा हुई।
यह वह अवस्था थी, जब चरित्र का निर्माण होता है। नरेन्द्र के चरित्र का वास्तविक निर्माण भी रायपुर में हुआ। उस समय वहां कोई स्कूल नहीं था इसलिए विश्वनाथ बेटे को खुद ही घर पर पढ़ाया करते थे। उन्हें वहां न तो अदालत जाना होता था और न मुवक्किलों से माथा-पच्ची करनी पड़ती