नरेन्द्र ने विस्मय की सीमा न थी। वह लौटते समय मन ही मन सोचने लगा कि आखिर यह पहेली क्या है? इस पहेली को तो समझना ही होगा। नरेन्द्र की इस समय की मनःस्थिति को स्वामी सारदानन्द ने अपने गं्रथ ‘श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग में यों व्यक्त किया हैः

‘‘मैं सोचने लगा कि इच्छा मात्र से यह पुरूष यदि मेरे जैसे प्रबल इच्छशक्ति-सम्पन्न चित्त को दृढ़ संस्कारयुक्त गठन को इस तरह तोड़-फोड़ कर मिट्टी के लौंदे की तरह अपने भाव में ढाल सकते हैं तो इन्हें पागल ही कैसे समझूं? किन्त प्रथम दर्शन के दिन मुझे एकान्त में ले जाकर इन्होंने जिस प्रकार सम्बोधित करते हुए बातें की थी, उससे इन्हें पागल के अतिरिक्त और क्या मान सकता हूं। बुद्वि का उन्मेष होने के अनन्तर खोज तथा तर्कयुक्ति की सहायता से प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्ति के संबंध में एक मतामत स्थिर किए बिना मैं कभी निश्चित नहीं हो सका। इसी स्वभाव में आज एक


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से रायपुर जाने में दो सप्ताह से अधिक लगते थे और हिंसक जन्तुओं वाले घने जंगल में से बैलगाड़ी द्वारा जाना पड़ता था। बाद में इस यात्रा का उल्लेख करते हुए नरेन्द्रनाथ ने लिखा है, ‘‘वनस्थली का सौंदर्य देखकर मुझे रास्ते के कष्ट, कष्ट ही मालूम नहीं हुए। विंध्य पर्वत की आकाश को चुमती हुई चोटियां, फूलों और फलों से लदी हुई तरह-तरह की बेलें, कंुज-कुंज में चहचहाते हुए रंग-बिरंगें पक्षी, जो कभी-कभी आहार की खोज में भूमि पर उतर जाते थे। नरेन्द्र ने यह सब कुछ पहले-पहल


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