है, वे हमें सभ्य बनाने के मिशन पर आए हैं, लूट-खसोट उनका उद्देश्य कदाचित नहीं है।
हमारे देश के उभरते हुए पूंजीपति वर्ग को इस विदेशी आक्रमण से अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं की रक्षा करनी थी, क्योंकि राष्ट्रीयता का विकास उन्हीं के आधार पर सम्भव था और राजनीतिक लड़ाई भी उन्हीें के आधार पर लड़ी जा सकती थी।
इसी विदेशी सांस्कृतिक आक्रमण के प्रतिक्रियास्वरूप उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ ही में पुनर्जागरण की चेतना का प्रादुर्भाव हुआ, जिसके प्रथम प्रवक्ता राजा राममोहन राय और अंतिम विवेकानन्द थे। रूपक की भाषा में यों कह लीजिए कि विवेकानन्द पुनर्जागरण के सुविकसित कमल थे-सुन्दर भी और सुगंधित भी।
अतएव उक्त परिस्थितियों में हमारे उभरते हुए बुर्जवा ने अपनी राजनीतिक लड़ाई धर्म के माध्यम से लड़ी। विवेकानन्द ने अपने मद्रास के भाषण में कहा था कि पुनर्जागरण की तरंग ने मुझे ज़बरदस्ती बाहर फेंक
के क्रमविकास से पृथक है। जड़ का क्रमविकास चैतन्य की विकास प्रणाली का सूचक या प्रतीत-स्वरूप है, किन्तु उसके द्वारा इस प्रणाली की व्याख्या नहीं हो सकती। वर्तमान पार्थिव परिस्थिति में बद्व रहने के कारण हम अभी तक व्यक्तित्व नहीं प्राप्त कर सके।’’
और शिकागो धर्म-महासभा में भाषण देते हुए विवेकानन्द ने अपने इस क्रमविकास के सिद्वांत की व्याख्या यों की थी: ‘‘विज्ञान एकत्व की खोज के सिवा और कुछ नहीं है। ज्यों ही कोई विज्ञान पूर्ण एकता तक पहुंच जाएगा, त्योंही उसकी प्रगति रूक जाएगी, क्योंकि