मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनका एक अंश एक प्रकाश-पंुज के रूप में धरती की ओर उतर रहा है। जब मैंने नरेन्द्र को देखा तब देखते ही पहचान लिया कि ऋषि का रूप वही है। ’’(पृष्ठ 35)

नरेन्द्र घबराया और भय से चिल्ला उठा, ‘‘अजी, आपने यह मेरी कैसी अवस्था कर डाली, मेरे तो मां-बाप हैं।’’

अब वह अद्भुत पागल खिलखिलाकर हंस पड़ा और नरेन्द्र का हाथ अपनी छाती पर रखकर बोला, ‘‘अच्छा, तो फिर अभी रहने दे।’’

इसके बाद रामकृष्ण परमहंस फिर सामान्य स्थिति में आ गए। उन्होंने नरेन्द्र को पहले ही दिन की तरह प्रेमपूर्वक खिलाया-पिलाया, विभिन्न विषयों पर बातचीत की, प्यार और हास-परिहास किया और शाम को जब नरेन्द्र ने विदा चाही तो उन्होंने अप्रसन्न होकर कहा, ‘‘बोल, फिर शीघ्र ही आएगा तू!’’ लिखा है, ‘‘लाचार होकर पहले दिन की तरह वचन देकर ही लौटना पड़ा।’’


69 of 675

हुुआ। यह रोग कई दिन तक रहा और इससे शरीर सूखकर कांटा हो गया। उस समय उसके पिता अपने काम से रायपुर में थे और उन्हें वहां अभी काफी दिन रहना था। इस ख्याल से कि हवा बदलने से स्वास्थ्य ठीक हो जायेगा, उन्होंने परिवार के लोगों को भी रायपुर बुला लिया। 1877 में नरेन्द्र अपने पिता के पास रायपुर पहुंचे।

रायपुर मध्यप्रदेश का एक नगर है। उस समय सारे मध्यप्रदेश में रेलगाड़ी नहीं थी। इलाहाबाद और जबलपुर होते हुए कलकत्ता से नागपुर तक गाड़ी आती थी। नागपुर


69 of 1117