को समाधि लगाए बैठे देखा। मुझे ध्यान हुआ कि इन ऋषियों ने ज्ञान और पवित्रता में, त्याग और प्रेम में न केवल मानवों को वरन् देवों को भी पीछे छोड़ दिया होगा। मैं मुग्ध भाव से उनकी महत्ता का चिंतन कर ही रहा था कि उस अरूप प्रकाश-क्षेत्र के एक अंश ने घनीभूत होकर एक दिव्य शिशु का रूप ग्रहण कर लिया। वह शिशु एक ऋषि के समीप आकर उनके गले से लिपटकर मधुर स्वर से पुकारता हुआ समाधि से जगाने का प्रयत्न करने लगा। समाधि से जागकर ऋषि ने अपने अद्र्वोन्मीलित नेत्र शिशु पर स्थित कर दिए। उनकी वात्सल्यभरी मुद्रा से स्पष्ट था कि शिशु उन्हें कितना प्रिय है। आनन्द-विभोर होकर शिशु ने कहा, ‘‘मैं नीचे जा रहा हूं। आप भी मेरे साथ चलें’’ ऋषि ने उत्तर नहीं दिया, पर उनकी वत्सल दृष्टि में स्वीकार का भाव था। शिशु की ओर देखते-देखते
31 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वह फिर समाधिस्थ हो गए।
भी हर तरह चुस्त-दुरूस्त थे। पर नरेन्द्र से उनका कोई मुकाबला न था। वह जब नरेन्द्र से स्वामी विवेकानन्द बन गया तो बाल्यकाल के बारे में उसने एक शिष्य से बातें करते हुए कहा,‘‘मैं बचपन ही से जिद्दी शैतान था। नहीं तो क्या खाली हाथ सारी दुनिया घूम आना संभव था।’’
शिक्षा
‘‘चूंकि हम लोगों ने अपना आधा जीवन विश्वविद्यालयों में बिता दिया है, अतः हमारा मन दूसरों के विचारों से भर गया है।’’
-विवेकानन्द
नरेन्द्रनाथ जब चैदह बरस का था तो उसे पेट का भयंकर रोग