वे बैठक में लौट आए। वहां दूसरों की मौजुदगी में जो बातें हुई, उनमें पागलपन का लेशमात्र भी न थी।
रामकृष्ण ने नरेन्द्र के जन्म के बारे में अपने शिष्यों को भावावेश में एक अद्भुत कथा सुनाई थी। वह कथा रोमां रोलां ने अपनी पुस्तक -विवेकानन्द’ में यों बयान की हैः
‘‘एक दिन समाधि में मैंने पाया कि मेरा मन प्रकाश के पथ पर ऊंचाा उठ रहा है। तारा जगत् को पार करके वह शीघ्र ही विचारों की सूक्ष्मतर जाति में प्रविष्ट हुआ तथा और ऊंचाा उठने लगा। पथ के दोनों ओर मुझे देव-देवताओं के सूक्ष्म शरीर दीख पड़ने लगे। उस मंडल को भी पार करके मन वहां पहुंच गया, जहां प्रकाश की एक मर्यादा-रेखा सापेक्ष्य अस्तित्व को निरपेक्ष्य से पृथक कर रही थी। उस रेखा का भी उल्लंघन करके मन वहां पहुंच गया, जहां सरूप कुछ भी नहीं अपने-अपने आसन पर ही संतुष्ट थे। किन्तु क्षण-भर बाद ही मैंने सात ऋषियों
ने उससे कहा। ‘‘नहीं भाई, ब्रह्मराक्षस की बात कौन जाने? न मालूम कब किधर से आकर गर्दन मरोड़ डाले’’। साथी ने उत्तर दिया। ‘‘धत्! तू भी निपट मूर्ख है।’’ नरेन्द्र बोला, ‘‘तेरे दादा डराने के लिए झूठ-मूठ बात बना गए। अगर पेड़ पर सचमुच ब्रह्मराक्षस रहता तो उसने मेरी गर्दन कब की मरोड़ दी होती।’’
नरेन्द्र का यही स्वभाव सारी उम्र बना रहा। किसी भी बात पर विश्वास करने से पहले वह उसे तर्क की कसौटी पर कसता था।
महेन्द्र और भूपेन्द्र उसके छोटे भाई