कहां रहा? मैं कब से तेरी बाट जोह रहा हूं। विषयी लोगों के साथ बात करते-करते मेरा मुंह जल गया। आज तेरे समान सच्चे त्यागी के साथ बात करके मुझे शान्ति मिलेगी।’’ यह कहते-कहते उनकी आंखों में आंसू बह निकले। नरेन्द्र हत्बुद्वि-सा उनकी ओर ताकता रहा।

देखते ही देखते रामकृष्ण परमहंस ने हाथ जोड़कर नरेन्द्र को सम्मान से सम्बोधित किया, ‘‘मैं जानता हूं, तू सप्तर्षि-मंडल है-नर रूपी नारायण है, जीवों के कल्याण की कामना से तूने देह धारण की है....’’

नरेन्द्र का कहना है कि उनके मुख से ऐसी बातें सुनकर मैं एकदम अवाक् और स्तम्भित रह गया। सोचा, यह तो निरा पागलपन है। मैं विश्वनाथ दत्त का पुत्र, मुझसे वे यह क्या कह रहे है! उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर दोबारा कहा, ‘‘मुझे वचन दे कि तू मुझसे मिलने फिर अकेला आएगा और शीध्र।’’

नरेन्द्र ने इस अद्भुत स्थिति से छुटकारा पाने के लिए वचन तो दे दिया, पर मन में सोचा कि फिर यहां नहीं आऊंगा।


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ही देता है। वह तो बिना दिखाई एि ही गर्दन झपट लेता है।’’ बूढे़ ने ब्रह्मराक्षस की विकट आकृति का वर्णन किया और क्रूरता के दो-चार उदाहरण देकर समझाया कि वह अपने आश्रित पेड़ का अपमान कभी सहन नहीं करेगा। नरेन्द्र को चुप देखकर

21 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

बूढे़ ने समझा कि सीख काम कर गई। पर जैसे ही बूढ़ा वहां से हटा नरेन्द्र फिर उसी ऊंची चोटी पर चढ़ बैठा। लेकिन उसके साथी की हिम्मत नहीं पड़ी। वह भयभीत-सा नीचे खड़ा रहा। ‘‘आओ न ऊपर’’ नरेन्द्र


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