यह प्रसंग छिड़ा तो नरेन्द्र ने साफ कह दिया कि मैं ब्याह के बंधन में नहीं पड़ूंगा, क्योंकि मैंने जीवन का जो उद्देश्य बना रखा है, ब्याह उसमें बाधक बनेगा। उत्तर सुनकर डाक्टर रामचन्द्र ने कहा, ‘‘यदि वास्तव में सत्य की प्राप्ति ही तुम्हारा उद्देश्य है तो ब्रह्मसमाज आदि में भटकना व्यर्थ है। तुम दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण देव के पास जाओ।’’
नरेन्द्र को सुरेन्द्रनाथ के मकान पर हुई भेंट याद आई और वह तीन-चार मित्रों के साथ दक्षिणेश्वर पहुंचा।
रामकृष्ण चिरपरिचित की तरह सहज भाव से मिले। नरेन्द्र को अपने करीब चटाई पर बैठा लिया और गाना सुनाने को कहा। नरेन्द्र ने ब्रह्मसमाज का ‘मन चलो निज निकेतन’ गीत गाया। फिर नरेन्द्र के अपने अनुसार जब गाना समाप्त हुआ तो वह उसे हाथ पकड़कर एकान्त में ले गए और भीतर से कमरा बंद करके
30 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
बोले, ‘‘अरे तू इतने दिन
एक दिन वह पेड़ की ऊंची टहनी पर इसी प्रकार झूल रहा था कि उसके एक साथी का दादा उधर आ निकला। बूढ़े का हृदय भय से कांप गया। एक तो ऊंचाई दूसरे नरेन्द्र के उत्पात से टहनी टूटने की काफी आशंका थी। बूढ़ा यह भी जानता था कि नरेन्द्र डराने-धमकाने से मानने वाला नहीं। इसलिए उसने दुलार से कहा, ‘‘बेटा, इस पेड़ पर न चढ़! इस पर तो ब्रह्मराक्षस रहते हैं।’’ नरेन्द्र बोला, ‘‘कहां हैं ब्रह्मराक्षस! ळमने तो देखा नहीं’’। बूढे़ ने फिर कहा, ‘‘ब्रह्मराक्षस दिखाई थोड़े