न मिलने के कारण उन्होंने अपने पड़ोसी नरेन्द्रनाथ को बुला लिया। रामकृष्ण परमहंस से यों नरेन्द्रनाथ का पहली बार साक्षात्कार हुआ। गाना सुना तो उन्होंने इस युवक की प्रतिभा को पहचान लिया। वह उठकर नरेन्द्र के पास आए, कुछ देर बातें की और फिर दक्षिणेश्वर आने का अनुरोध करके चले गए।

एफ.ए की परीक्षा निकट थी, नरेन्द्र उसमें इतना व्यस्त रहा कि इस बात को भूल ही गया। परीक्षा समाप्त हुई तो पिता ने ब्याह की बात चलाई। नरेन्द्र का भावी ससुर दहेज में दस हजार रूपये नकद देने को तैयार था। पर नरेन्द्र इस झंझट में कैसे पड़ता? वह मित्रों से कहा करता था, ‘‘मैं विवाह नहीं करूंगा, और तुम लोग देखोगे कि मैं क्या बनता हूं।’’ विश्वनाथ बाबू बेटे पर किसी प्रकार का दबाव नही डालते थे। अब इस मामले में नरेन्द्र की राय जान लेने का काम उन्होंने अपने संबंधी डाक्टर रामचन्द्र दत्त को सौंपा। जब


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नावों में चले गए। यों नरेन्द्र के साथियों ने संकट से छुटकारा पाया। दोनों सिपाही नरेन्द्र के इस आचरण से बहुत प्रसन्न हुए। वह उसे अपने साथ थियेटर ले जाना चाहते थे। पर वह अपने हमजोलियों के साथ लौट आया।

नरेन्द्र को भय दिखाकर किसी काम से रोकना संभव नहीं था। इस सिलसिले की एक घटना इस प्रकार है।

उसके एक पड़ोसी साथी के घर में चम्पक फूल का एक पेड़ था। पेड़ की टहनी में पैर की गोंफ डालकर सिर और हाथ नीचे लटकाकर झूलना नरेन्द्र का प्रिय खेल था।


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