करने के बाद शेष समय साधना-भजन में बिताता था। सत्येन्द्रनाथ मजूमदार अपनी ‘विवेकानन्द-चरित’ पुस्तक में लिखते हैंः

‘‘इस प्रकार दिन पर दिन बीतते गये, पर सत्य को जानने की उनकी इच्छा तृप्त तो हुई नहीं, अपितु अधिकाधिक बढ़ने लगी। धीरे-धीरे उन्होंने समझा कि अतींद्रिय सत्य को प्रत्यक्ष करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति के चरणों के पास बैठकर शिक्षा-लाभ करना आवश्यक है, जिसने स्वयं उस सत्य का साक्षात्कार किया है। उन्होंने अपने मन-प्राण से यह भी निश्चय कर लिया कि इसी जीवन में सत्य को प्राप्त करना होगा। नहीं तो इसी प्रयत्न में प्राण दे देने होंगे।’’ (पृष्ठ 83-84)

सुरेन्द्रनाथ मित्र रामकृष्ण परमहंस के भक्त थे और वे शिमला मोहल्ला में ही रहते थे। नवम्बर 1881 के एक दिन उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को अपने मकान पर बुलाया और इस उपलक्ष में एक अनन्दोत्सव का आयोजन किया। कोई अच्छा गायक


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सिपाही मैदान के रास्ते से टहलने जा रहे हैं। वह दौड़कर उनके पास आया और नमस्ते करके एक का हाथ पकड़ लिया। अंगे्रजी तो जानता न था, नरेन्द्र ने उन्हें इशारों से अपनी बात समझायी और घाट की तरफ चलने के लिए खींचने लगा। एक छोटे-से सुन्दर बालक के इस आग्रह से सिपाही बहुत खुश हुए। वे तुरन्त नाव के पास आए और सारी बात समझ गए उन्होंने हाथ का बंेत उठाकर मल्लाहों को डांटा और बच्चों को छोड़ देने का आदेश दिया। गोरे सिपाहियों को देखकर मल्लाह लोग डरे और अपनी-अपनी


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