वह निर्भीक आलोचना करता था। उसका मन अब भी अशान्त था। और जिस जीते-जागते सत्य की उसे खोज थी, वह यहां भी दिखाई नहीं पड़ा। एक दिन देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने उसे उपदेश देते हुए कहा ‘‘तुम्हारे अंग-प्रत्यंग में योगियों के चिहृ मौजूद हैं। ध्यान करने ही से तुम्हें शांति और सत्य की प्राप्ति होगी।’’
नरेन्द्र लगन का पक्का था। उसी दिन से ध्यानानुराग में रंग गया। थोड़ा खाना, चटाई पर सोना, सफेद धोती और चद्दर पहनना और शारीरिक कठोरता का पालन करना उसका नियम बन गया।
उसने अपने घर के निकट नानी के मकान में एक कमरा किराये पर ले रखा
29 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
था। परिवार के लोग समझते थे कि घर पर पढ़ाई की असुविधा के कारण ही नरेन्द्र अलग रहने लगा है। विश्वनाथ बाबू ने बेटे की स्वाधीनता के कभी हस्तक्षेप नहीं किया था। इसलिए नरेन्द्र अध्ययन, संगीत आदि की चर्चा
नाव में उलटी कर दी। मुसलमान मल्लाह बहुत भिन्नाया और कहा, ‘‘नाव साफ किए बिना किसी को उतरने नहीं दूंगा।’’ किसी दूसरे आदमी से साफ करा लेने के लिए लड़कों ने पैसे देना चाहे। पर वह नहीं माना और घाट के दूसरे मल्लाहों को इकट्ठा करके उन्हें मारने पर उतारू हो गया। झगड़ा बढ़ते देखा तो नरेन्द्र नाव से उतर गया। वह चूंकि सबसे छोटा था इस लिए मल्लाहों ने उसे नहीं रोका।
किनारे पर पहुंचकर नरेन्द्र अपने साथियों की रक्षा का उपाय सोचने लगा। उसने देखा कि दो गोरे