उनसे ईष्र्या करते थे और स्वयं केशव बनने की महत्वकांक्षा रखते थे। लेकिन इसके बावजुद वह उनके अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज के सदस्य नहीं बने। कारण यह था कि अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज राजा राममोहन राय के आदर्श और परम्परा से हट चुका था। केशव और उनके अनुयायी ईसाइयत में रंगे हुए थे और उनका चलन सनातन हिदू धर्म की उच्चतक मान्यताओं के प्रतिकूल था। लेकिन नरेन्द्र की बचपन ही से इन मान्यताओं में आस्था थी। संदेहवादी होते हुए भी उसमें दूसरे नौजवानों-सी उच्छृंखलता और अराजकता न थी।
नरेन्द्रनाथ ब्रह्मसमाज की रविवारीय उपासना में शामिल होता था और अपने मधुर कंठ से ब्रह्म संगीत सुनकर सदस्यों का मन प्रसन्न किया करता था। पर उपासना के विषय में वह दूसरे सदस्यों से सहमत नहीं था। उसे ब्रह्मसमाज में त्याग और धर्मनिष्ठा की कमी महसूस होती थी। नरेन्द्र जो कुछ देखता था, उसकी
बालक को सुरक्षित देखकर लोग बड़े खुश हुए और सभी ने नरेन्द्र के साहस
20 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
की दाद दी।
नरेन्द्र के अपूर्व साहस की एक घटना और है।
कलकत्ता के दक्षिण मटिया बुर्ज में लखनऊ के भूतपूर्व नवाब वाजिद़ अली शाह की पशुशाला थी। नरेन्द्र की उम्र कोई सात-आठ बरस होगी कि वह अपने हमजोलियों के साथ एक दिन यह पशुशाला देखने गया। लड़कों ने आपस में चन्दा करके चांदपाल घाट से एक छोटी-सी नाव किराये पर ले ली। लौटते समय एक बच्चे ने