या ‘‘ना’’ में उत्तर देने के बजाए धर्म-प्रचारक उपदेश वाक्यों से उसे संतुष्ट करना चाहते और अपना पुस्तक-ज्ञान बघारने लगते। नरेन्द्र को तो प्रत्यक्षवादी की खोज थी। धर्म-प्रचारकों की रटी-रटाई सम्प्रदायगत बोलियां सुनकर वह प्रबल संदेहवादी हो गया।
पिता से विरासत में पाई हुई आलोचना-वृत्िा पर पाश्चात्य विचारों की सान चढ़ चुकी थी, अतएव पुस्तक-ज्ञान नरेन्द्र को शान्त नहीं कर पा रहा था। उसे अब एक जीते-जागते आदर्श की खोज थी। इसी खोज का वह कुछ मित्रों के साथ आदि ब्रह्मसमाज का सदस्य बन गया।
ब्रह्मसमाज चंद साल पहले आदि ब्रह्मसमाज और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज में विभाजित हो गया था। पहले के नेता देवेन्द्रनाथ ठाकुर और दूसरे के केशवचन्द्र सेन थे। केशव बहुत बड़े वक्ता थे और उस समय उनकी ख्याति शिखर पर थी। बंगाली नौजवान उनसे बेहद प्रभावित थे। रोमां रोलां का कथन है कि नरेन्द्रनाथ
की मूर्तियां खरीदी। शाम को जब वे घर लौट रहे थे तो एक छोटा-सा लड़का दल से अलग हो गया और फुटपाथ से रास्ते में चला गया। ठीक उसी समय समाने से एक घोड़ागाड़ी आई, जिसे देख बालक घबरा गया। राह चलते राही रूक गए और ‘बचाओ ! बचाओ! चिल्लाने लगे। शोरगुल सुनकर नरेन्द्र ने पीछे की ओर देखा और सारी स्थिति भांप ली। एक क्षण की भी देर नहीं लगाई। महादेव की मूर्तियां फेंककर वह तेजी़ से लपका। बालक घोड़े के पैरों तले रौंदा ही जानेवाला था कि नरेन्द्र ने उसे बाल-बाल बचा लिया।