ने पहली बार क्रमविकास का सिद्वांत भारतीय दर्शन पर लागू किया और अद्वैत को धर्मशास्त्र की चरम सीमा बताया।

ऐसा अनायास नहीं हुआ। इसके भौतिक और आर्थिक कारण थे, एक विशेष प्रयोजन था। इसे समझने के लिए हमें उस समय की सामाजिक और राजनैतिक परिस्थिति को समझना होगा।

उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्व में हमारे देश में पूंजीवादी वर्ग अस्तित्व में आया था और वह स्वभावतः विस्तार चाहता था। पर उसके विस्तार का मार्ग विदेशी

साम्राज्यवादी शासकों ने अवरूद्व कर रखा था। अंग्रेज शासक सैन्य बल में बढे़-चढे़ थे, उनकी औद्योगिक सभ्यता निश्चित रूप से हमारी सामंती सभ्यता से श्रेष्ठ थी। अर्थतंत्र और व्यापार पर उनका अधिकार था। इसके अलावा उन्होंने हमारे आत्मविश्वास को तोड़ने अर्थात् हमारी राष्ट्रीय भावना को नष्ट करने के लिए सांस्कृतिक आक्रमण भी शुरू कर दिया। इस क्षेत्र में उनका नारा था कि हम मूर्ति-पूजक तथा जंगली


6 of 675

संस्थाओं का विकास हुआ है और उसके साथ ही विचार का भी विकास हुआ है। यों माक्र्स ने हेगल के द्वन्द्वात्मक आदर्शवाद को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में बदल दिया, यानी उसे पांव के बल सीधा खड़ा कर दिया।

अब देखिए, विवेकानन्द कहते हैं: ‘‘मेरे मत में बाह्म जगत् की एक सत्ता-हमारे मन के विचार के बाहर भी उसका एक अस्तित्व है। चैतन्य के क्रमविकास रूपी महान विधान का अनुवर्ती होकर यह सम्रग विश्व उन्नति के पथ पर अग्रसर हो रहा है। चैतन्य का यह क्रमविकास जड़ के क्रमविकास जड़


6 of 1117