बहुमुखी प्रतिभा के बहुत प्रशंसक थे और इसीलिए उसे सबसे अधिक चाहते थे। एक मर्तबा नरेन्द्र ने जब कालेज के ‘दार्शनिक क्लब’ में किसी मत विशेष का सूक्ष्म विश्लेषण किया तो हेस्टी खुशी से झूम उठे और मुक्त कंठ विश्वविद्यालयों में एक भी ऐसा छात्र नहीं है जो इनके समान मेधावी हो।’’ (विवेकानन्द-जीवन चरित्र, पृष्ठ 78)

अध्ययन और आयु बढ़ने के साथ-साथ नरेन्द्र की जिज्ञासा तीव्र से तीव्रतर

28 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

होती चली गई। मानव जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या सचमुच इस जड़ जगत को चलाने वाली कोई शक्तिमान सत्ता है? इस प्रकार के अनेकों सवाल उसके मस्तिष्क में उठने लगे। पाश्चात्य विज्ञान और दर्शनशास्त्र ने उसके मन में संदेह उत्पन्न कर दिए। नरेन्द्र जब किसी धर्म-प्रचारक को ईश्वर के बारे में भाषण देते सुनता तो झट पूछ बैठता, ‘‘क्यों महाशय, आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं? ‘‘हां’’


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फेसला करता। अगर देखता कि उसकी बात नहीं मानी जा रही और लड़के आपस में मार-पीट पर उतारू हैं तो वह निर्भीक भाव से बीच में खड़ा होकर उन्हें रोक देता। शारीरिक बल में नरेन्द्र अपने किसी भी हमजोली से हेठा न था, बल्कि उसका असीम साहस देख बड़े भी दंग रह जाते थे। घूंसा-घूंसी में निपुण होने के कारण दुष्ट लड़के उससे दबते थे।

जब उसकी अवस्था केवल छह बरस थी, वह अपने हमजोलियों के साथ ‘चड़क’ का मेला देखने गया। मेला देखा और मिट्टी की बनी हुई शिव


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