का आरोप लगाने में भी संकोच नहीं करते थे। पर नरेन्द्र में मन में किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं था। और अपनी ही बात को ऊंचा रखने के लिए वह कभी कुतर्क का सहारा नहीं लेता था। उसे जो कहना होता था दूसरे के सामने साफ-साफ कहता था। कोई उसकी बात से चिढ़ता है, उसके बारे में क्या राय रखता है या उसकी निन्दा करता है-इस बात की उसे ज़रा भी परवाह नहीं थी। उसका हृदय शुद्व था और वह खुद पीठ-पीछे किसी की निंदा या बुराई नहीं करता था। धीरे-धीरे जब उसका यह स्वभाव उजागर हुआ तो विद्यार्थी उसकी बात ध्यान से सुनते और उसका आदर करने लगे।
जनरल असेम्बली कालेज के अध्यक्ष विलियम हेस्टी सज्जन व्यक्ति होने के अलावा बड़े विद्वान, कवि और दार्शनिक थे। नरेन्द्र, ब्रजेन्द्र आदि कुछ प्रतिभाशाली विद्यार्थी नियमित रूप से उनके पास जाते और दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया करते थे। हेस्टी नरेन्द्र की
पंच बरस पूरे होने पर नरेन्द्र की शिक्षा कुछ दिन घर पर हुई। इसके बाद उसे मेट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूट में भेज दिया गया। वहां नरेन्द्र को बहुत से हमउम्र सहपाठी मिले। नये साथी पाकर उसके आनन्द की सीमा न रही और उसने जल्दी ही अपना एक छोटा-सा दल संगठित कर लिया। उसके ये साथी सुबह-शाम घर पर खेलने आते। ‘दत्त भवन’ का विशाल आंगन उनके कोलाहल से गूंज उठता।
खेल में अगर कोई लड़का किसी प्रकार की धांधली करता तो नरेन्द्र बहुत बिगड़ता और आगे बढ़कर