करते थे। रोमां रोलां ने लिखा है कि ब्रजेन्द्र फ्रांसिसी क्रांति से प्रभावित थे और अराजकतावादी थे। बाद में उन्होंने एक बुद्विवादी के रूप में नाम पाया।
मैट्रिक पास करते-करते नरेन्द्र की बुद्वि इतनी विकसित हो गई थी कि कोई पुस्तक पढ़ने में अधिक समय नहीं लगाना पड़ता था। अपनी अध्ययन-पद्वति की चर्चा करते हुए वह अपने गुरू-भाइयों से कहा करता थाः
27 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
‘‘अब से कोई पुस्तक पढ़ते समय प्रत्येक पंक्ति क्रमशः पढ़कर गं्रथकर का वक्तव्य समझने की मुझे आवश्यकता नहीं होती थी। हर अनुच्छेद की प्रथम और अंतिम पंक्तियां पढ़ते ही उसके भीतर क्या कहा गया है, मैं समझ लेता था। शनैःशनैः वह शक्ति परिपक्व होने पर हर अनुच्छेद पढ़ने का भी प्रयोजन नहीं होता था। हर पृष्ठ की प्रथम और अंतिम पंक्तियां पढ़कर ही मैं आश्य समझ सकता था। फिर पुस्तक के जिस स्थान पर गं्रथकार ने कोई
19 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
यहां तक कि सगत्व, ब्रह्मत्व, शिवत्व प्राप्ति के प्रति उपेक्षा। केवल रघुनाथ के उपदेश का पालन ही जीवन का एकमात्र व्रत। उसी प्रकार एकनिष्ठ होना चाहिए। ढोल, मृदंग, करताल बजाकर उछल-कूद मचाने से देश पतन के गर्त में जा रहा है। एक तो यह पेट के रोगी मरीजों का दल और उस पर इतनी उछल-कूद! भला कैसे सहन होगी? कामविहीन उच्च साधना का अनुसरण न करके देश घोर तमोगुण से भर गया है। देश-देश में, गांव-गांव में-जहां भी जाओगे,