साहित्य, दर्शन और इतिहास की पुस्तकें अधिक पढ़ता था। देकार्त का अहम्वाद, ह्यूम और वेन की नास्तिकता, डार्विन का विकासवाद और इसके अलावा हर्बर्ट स्पेन्सर का अज्ञेयवाद उसने एफ. ए. की परीक्षा देने से पहले पढ़ डाला था। उसके मित्र ब्रजेन्द्र बाबू ने ‘प्रबुद्व भारत’ पत्रिका में अपने संस्मरण लिखे थे, जिनमें नरेन्द्र की अशन्ति और ज्ञान-पिपासा का चित्र, प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया है कि नरेन्द्र ने शेली की कविताओं, हेगल के दर्शन और फ्रांसिसी क्रांति के इतिहास का अध्ययन भी इसी अवस्था में कर लिया था। इसके अलावा संस्कृत कविता, उपनिषद् और राममोहन राय की पुस्तकें भी वह बड़े चाव से पढ़ा करता था। पढ़ते समय वह चंचल और खिलाड़ी नरेन्द्र से एकदम भिन्न दूसरा ही व्यक्ति होता था।
ब्रजेन्द्र बाबू कालेज में नरेन्द्र से दो-तीन बरस आगे थे। पर इन दोनों में खूब पटती थी। वे दोनों ‘दार्शनिक क्लब’ में जाया
को ही तुम्हें इस समय आदर्श मानना पड़ेगा। देखो, न, वे राम की आज्ञा से समुद्र लांघकर चले गए! जीवन-मृत्यु की परवाह कहां? महाजितेन्द्रिय, महाबुद्विमान, दास्य-भाव के उस महान आदर्श से तुम्हें अपना जीवन गठित करना होगा। वैसा करने पर दूसरे भावों का विकास स्वयं ही हो जाएगा...अवलम्बन करने योग्य और दूसरा पथ नहीं। एक ओर हनुमान जी जैसा सेवा भाव और दूसरी ओर उसी प्रकार त्रैलोक्य को भयभीत कर देने वाला सिंह जैसा विक्रम!....राम की सेवा के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों के प्रति उपेक्षा,