के बोल भी बतला दिए। मित्र एक-दो बार चेष्टा करने के बाद किसी तरह ठेका देने लगा। गाना आरम्भ हुआ। तानलय में उन्मुक्त होकर और दूसरों को उन्मुक्त बनाकर नरेन्द्र के हृदयस्पर्शी स्वर में टपपा, ढप, ख्याल, ध्रुुपद, बंगला, हिन्दी और संस्कृत गानों का प्रवाह चलने लगा।’’ (विवेकानन्द साहित्य, अष्टम खंड, पृष्ठ 259-60)
गम्भीर चिंतन शक्ति और तीक्ष्ण बुद्वि के कारण नरेन्द्र सभी विषय बहुत थोड़े समय में सीख लेता था। संगीत, स्वच्छंद भ्रमण, मित्रों के साथ खेल-कूद और हंसी-मजाक के लिए उसे काफी समय मिल जाता था। दूसरे लड़के इससे यह समझ लेते थे कि नरेन्द्र की अध्ययन में बिल्कुल रूचि नहीं है। उनकी देखा-देखी जो दूसरे लड़के खेल-कूद में समय बिताते उनके लिए इसका परिणाम अच्छा नहीं होता।
पाठ्य पुस्तकें तो परीक्षा पास करने का साधनमात्र थी, वरना जैसा कि उसका स्वभाव बन चुका था, नरेन्द्रनाथ
दर्शन कर सकता हूं?’’ पंडित ने भोले बालक को बहलाने के लिए उत्तर दिया, ‘‘हां बेटा, बगीचे में तुम उन्हें पा सकते हो।’’
नरेन्द्र ने इसके बाद भी हनुमान को बगीचे में ढूंढ़ा हो या न ढूंढ़ा हो, पर यह तय है कि वह हमेशा उनके प्रियपात्र बने रहे। जैसे-जैसे आयु बढ़ी, उनके प्रति श्रद्वा भी बढ़ती गई। मृत्यु से कुछ महीने पहले शिष्य शरच्चन्द्र चक्रवर्ती ने जब पूछा, ‘‘हमारे लिए इस समय किस आदर्श को ग्रहण करना उचित है?’’ तो उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘महावीर के चरित्र