‘‘नरेन्द्र आज मन लगाकर पढ़ रहे थे। इसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ। लगभग ग्यारह बजे होंगे। भोजन करके नरेन्द्र पढ़ रहे थे। मित्र ने आकर नरेन्द्र से कहा, ‘भाई, रात में पढ़ लेना, अभी ज़रा एक-दो गाने तो सुना दो।
26 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
‘‘उसी समय नरेन्द्र ने पुस्तक बंद कर उसे एक ओर सरका दिया। तानपूरे के तारों को संभालकर, उन्हें स्वर में बांधकर गाना गाने से पहले उन्होंने अपने मित्र से कहा, ‘अच्छा तू तबला उठा।’
‘‘मित्र ने कहा, ‘भाई मैं तो बजाना जानता नहीं। स्कूल में मेज़ का तबला बजा लेता हूं, तो क्या तुम्हारे साथ तबला भी बजा सकूंगा?’
‘‘तब नरेन्द्र ने स्वयं थोड़ा-सा बजाकर दिखा दिया और कहा, ‘अच्छी तरह से देख ले। अवश्य बजा सकेगा। क्यों नहीं बजा सकेगा? कोई कठिन काम तो है नहीं। इस तरह बस ठेका दिए जा, हो गया।’ साथ ही साथ बजाने
कि हनुमान अमर हैं और अब भी जीवित हैं। तब से वह उसे देखने के लिए बड़ा उत्सुक था। पर देखे तो कहां देखे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। एक दिन वह कथा सुनने गया तो कथाकार पंडित अपनी अलंकारिक भाषा में हास्य-रस मिलाकर हनुमान के चरित्र का वर्णन कह रहा था। नरेन्द्र के मन में जाने क्या आई, वह धीरे-धीरे कथाकार के पास गया और पूछा, ‘‘पंडित जी, आपने जो कहा है कि हनुमान केला खाना पसंद करते हैं और केले के बगीचे में रहते हैं, तो क्या मैं वहां उनके